गुड़ी पड़वा पर्व क्यों मनाया जाता है मान्यताएं क्या हैं जानिए हिंदी में: पवित्र त्योहार होली का बाद मनाए जाने वाले त्योहारों में से गुड़ी पावड़ा भी एक खास त्योहार है जिसे हमारे देश के लोग बड़ी शिद्दत से मनाते हैं. यह त्योहार चैत्र शुद्ध प्रतिपदा वर्ष के साढ़े तीन शुभ मुहूर्तों में से एक माना जाता है।

गुड़ी पड़वा पर्व क्यों मनाया जाता है मान्यताएं क्या हैं जानिए हिंदी में

गुड़ी पड़वा पर्व क्यों मनाया जाता है मान्यताएं क्या हैं जानिए हिंदी में

आपको बता दें कि सोने की लंका पर विजय के पश्चात भगवान श्रीराम के अयोध्या वापस लौटने का दिन भी चैत्र शुद्ध प्रतिपदा ही था। उस समय अयोध्या के नगर वासियों ने घर-घर गुढ़ी तोरण लगाकर भगवान श्री राम के लौटने पर  अपनी प्रसन्नता व्यक्त की थी। तभी से हमारे समाज में इस परंपरा का पालन किया जाने लगा है और इसीलिए होली के बाद गुड़ी पावड़ा को त्योहार मनाया जाता है।

इस त्योहार को लेकर एक कथन भी प्रचलित है कहा जाता है कि गुड़ी पावड़ा  में मोक्षद्वार का गुरुमंत्र छिपा है और तनकर खड़ी बांस की गुडीपरमार्थ में पूर्ण शरणागति का संदेश देती है. वहीं पड़वा अर्थात साष्टांग नमस्कार (सिर, हाथ, पैर, हृदय, आंख, जांघ, वचन और मन) आठ अंगों से भूमि पर लेटकर किए जाने वाले प्रणाम का संकेत देती है. इस त्योहार में आदर्श जीवन कला का प्रतिबिंब दिखाई देता है कि विनय से ही ज्ञान प्रप्त किया जा सकता है।

कैसे मनाते हैं गुड़ी पावड़ा का त्योहार

सबसे पहले गुडीकी लाठी को तेल हल्दी लगाकर सजाया जाता हैं. उसके बाद उस लाठी पर चांदी या तांबे का लोटा उल्टा डाल रेशमी वस्त्र पहना फूलों और शक्कर के हार और नीम की टहनी बांध उसे दरवाजे पर खड़ी करते हैं.

इसका मतलब है कि तनी हुई रीढ़ से इज्जत के साथ गर्दन हमेशा ऊंची रख जीना, यही तो गुडीहमें सिखाती है। इस प्रकल्प में ईश्वरीय अनुष्ठान भी जरूरी है और  यह सीख भी कहीं न कहीं इसी त्योहार में छिपी हुई है। आपको बता दें कि बांस की लाठी में रीढ़ की समानता नजर आती है तो चांदी का कलश मस्तक का प्रतीक है।

यह कलश ब्रह्मांड की विद्युत तरंगों को खींच कलशरूपी पिरामिड से नीचे की दिशा में शक्ति का अहसास कराता  है। उत्तम चैत्र मास और ऋतु वसंत का यह गुड़ी पावड़ा का दिन जब सूर्य किरणों में नई चमक होती है तो तनी हुई रीढ़ पर अधिष्ठित कलश सूर्य किरणों को एकत्र कर उन्हें परावर्तित करने का काम करता है।

गुड़ी हमें क्या संदेश देती है

हमारे लिए गुडी का संदेश यही है कि हम सूर्य से शक्ति पाएं और उसे समाज के शुभ कर्मों में लगाएं। स्नान, सुगंधित वस्तुओं, षडरस (मीठा, नमकीन, कडुवा, चरपरा, कसैला और खट्टा इन छह रसों), रेशमी वस्त्रालंकार, पकवान इन तमाम वस्तुओं का उपभोग गुड़ी पाबड़ा के इस  पावन त्योहार पर जरूरी होता है।

वसंत ऋतु के संधिकाल में तृष्णा हरण हेतु शक्कर और अमृत गुणों से भरपूर रोग रोधक नीम और गुड़ धनिए की योजना हमारे बुजुर्गों के आयुर्वेद समन्वय के नजरिए का प्रदर्शन करती है। ब्रह्मपुराण, अथर्ववेद और शतपथ ब्राह्मण में भी कहा गया है कि इसी दिन ब्रह्मा जी ने सम्पूर्ण सृष्टि की रचना की थी।

कहा जाता है कि महाभारत में युधिष्ठिर का राज्यारोहण भी इसी दिन हुआ था। इस दिन प्रात काल सूर्य को अर्घ दिया जाता है और  गुड़ी ब्रह्मध्वज के प्रतीक के तौर पर लगाई जाती है।  महाराष्ट्र में मराठा साम्राज्य की स्थापना करने वाले छत्रपत्रि शिवाजी की विजय ध्वजा के प्रतीक के तौर पर भी इसे लगाया जाता है।

क्यों मनाते हैं गुड़ी पड़वा, जानिए महत्व

चैत्र ही  एक ऐसा महीना है जिसमें वृक्ष तथा लताएं पुष्पित होती हैं और प्रकृति में जीवन का नया संचार होता है। शुक्ल प्रतिपदा का दिन चंद्रमा की कला का प्रथम दिवस भी माना जाता है। हमारे जीवन का मुख्य आधार वनस्पतियों को सोमरस चंद्रमा से ही मिलता है। इसे औषधियों और वनस्पतियों का राजा कहा गया है इसलिए इस दिन को वर्षारंभ का दिन भी माना जाता है।

आपको बता दें कि इस दिन को आंध्रप्रदेश और कर्नाटक में उगादिऔर महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वाके रूप में मनाया जाता है साथ ही आंध्रप्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में आम इसी दिन से खाना शुरु किया जाता है। आज भी हमारे समाज में  शिक्षा, राजकीय कोष या अन्य किसी भी शुभ कार्य के लिए इस अवसर को ही चुना जाता है और उसके पीछे मान्यता यही है कि इस अवसर पर मानव, पशु-पक्षी, यहां तक कि जड़-चेतन सभी आलस्य त्याग सचेतन हो जाते हैं।

इस दिन लोग अपने शरीर को शुद्ध करने के लिए बेसन और तेल का उबटन लगाकर नहाते हैं, इसके बाद पवित्र होकर हाथ में गंध, अक्षत, पुष्प और जल लेकर भगवान ब्रह्मा के मंत्रों का उच्चारण करके उनकी पूजा की जाती है.

गुड़ी पावड़ा क्यों किया जाता है नीम का रसपान – गुड़ी पड़वा के बारे में ये बातें जानते हैं

इस दिन नीम का रसपान किया जाता है, क्योंकि मंदिर में दर्शन करने वाले को नीम और शक्कर प्रसाद के रूप में दिया जाता है. नीम कड़वा होता है लेकिन आरोग्य भी है और शुरुआत में कष्ट देकर बाद में कल्याण करने वालों में से यह एक है.

ना जाने कितने ही विचार आचार में लाने में कष्टदायी होते हैं और वह कड़वे भी लगते हैं, लेकिन वही विचार जीवन को उदात्त बनाते हैं. ऐसे सुंदर, सात्विक विचारों का सेवन करने वाला व्यक्ति मानसिक और बौद्धिक आरोग्य पाता है.

और उसका जीवन निरोगी बनता है. प्रगति के रास्ते पर जाने वाले को जीवन में ना जाने  कितने कड़वे घूंटपीने पड़ते हैं, इसका भी इस त्योहार में दर्शन है.

गुड़ी पावड़ा पर ही शुरु होता है भारतीय नववर्ष

भारतीय नववर्ष का प्रारंभ भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही माना जाता है और इसी दिन से ग्रहों, वारों, मासों और संवत्सरों का प्रारंभ भी गणितीय और खगोल शास्त्रीय संगणना के अनुसार माना जाता है। आज भी हमारे जनमानस से जुड़ी हुई यही शास्त्रसम्मत कालगणना व्यावहारिकता की कसौटी पर खरी उतरी है।

गुड़ी पावड़ा को राष्ट्रीय गौरवशाली परंपरा का प्रतीक माना जाता है। विक्रमी संवत किसी संकुचित विचारधारा या पंथाश्रित नहीं है। हम इसको धर्म निरपेक्ष रूप में देखते हैं। यह संवत्सर किसी देवी, देवता या महान पुरुष के जन्म पर आधारित नहीं है, ईस्वी या हिजरी सन की तरह किसी जाति अथवा संप्रदाय विशेष का भी नहीं है।

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हमारे देश की गौरवशाली परंपरा विशुद्ध अर्थो में प्रकृति के खगोल शास्त्रीय सिद्धातों पर आधारित है और भारतीय काल गणना का आधार पूर्णतया धर्म निरपेक्ष है। प्रतिपदा का यह शुभ दिन भारत राष्ट्र की गौरवशाली परंपरा का प्रतीक माना जाता है।

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