आज के आर्टिकल में हम आपको प्राचीन भारत का इतिहास – History of Ancient India in Hindi के बारे में विस्तार से बताएँगे, भारतीय संस्कृति Indian culture सदियों पूरानी है। इसके बारे में जितना पढ़ेंगे यह हमें उतना ही गहरा व ज्ञानवर्धक लगेगा। इस लेख में हम आपको प्राचीन भारत के इतिहास में विस्तार से बताएंगे। इस लेख में हम आपको संगम काल,मौर्यकाल, धार्मिक आंदोलन, महाजनपद काल, वैदिक संस्कृत, सिंधु घाटी की सभ्यता, विजयनगर साम्राज्य, सल्लनतकाल, पूर्व मध्यकालीन भारत गुप्तोर काल आदि से संबंधित जानकारी मुहैया कराएंगे.

प्राचीन भारत का इतिहास मानव सभ्यता के उस समय का इतिहास हैजब नह अपने विकास व अपने निर्माण के अवस्था में था। विशाल पर्वतमालाओं और नदियों की भूमिका Prachin Bharat Ka Itihaas के निर्माण में बहुत महत्वपूर्ण रही है। वर्तमान मानव स्वरूप क्रमिक विकास का ही नतीजा है। इतिहासकारों ने अध्ययन हेतु सरलता की दृष्टि से इतिहास को कई भागों में बांटा है। प्राचीन भारत “Ancient India” उसी वर्गीकरण का एक हिस्सा है.

प्राचीन भारत का इतिहास - History of Ancient India in Hindi

प्राचीन भारत का इतिहास के बारे में पूरी जानकारी

Contents

पुरातात्विक स्रोत –

  • प्राचीन भारत के अधिकांश अभिलेख पाषाण शिलाओंस्तंभोंताम्रपत्रों दीवारों तथा प्रतिमाओं पर उत्कीर्ण हैं।
  • सबसे प्राचीन अभिलेखों में मध्य एशिया के बोगजकोई से प्राप्त अभिलेख गैं। इस पर वैदिक देवता – मित्रवरूणइंद्र और नासत्य के नाम पाए जाते हैं। इसी में से ऋग्वेद की तिथि ज्ञात करने में  सहायता मिलती है।
  • भारत में सबसे प्राचीन अभिलेख अशोक के हैं। अशोक के अभिलेख ब्राह्रीखरोष्ठीयूनानी तथा अरमाइक लिपियों में से हैं।
  • मास्कीगुर्जरानिट्टूर एवं उदेगोलम से प्राप्त अभिलेखों में अशोक के नाम का स्षष्ट उल्लेख पाया जाता है और इन अभिलेखों को ‘देवानॉपिय पियदसि यानि कि देवों का प्यारा‘ नाम से जाना जाता है।
  • सबसे पहले 1837ई में जेम्स प्रिंसेप ने ब्राह्री लिपि में लिखित अशोक के अभिलेख को पढ़ा था।
  • अशोक के बाद भी अभिलेखओं की प्रथा शुरू रही है। जिसमें प्रमुख रूप से हैं – प्राचीन भारत का इतिहास
अभिलेखशासकविषय
हाथीगुफाखारवेलइसमें खारवेस के शासन की विस्तृत जानकारीक्रमबद्ध विवरण
जूनागढ़ जिसे गिरनार अभिलेख के रूप में भी जाना जाता है।रुद्रदामनइसमें रूद्रदामन की विजयोंव्यक्तित्व एंव कृतित्व का विवरण है।
नासिकगौतमी बलश्रीसातवाहनकालीन घटनाओं की जानकारी
प्रयाग स्तंभ लेखसमुद्रगुप्तसमुद्रगुप्त के विजय एवं नितियों का पूरा विवरण
ऐहोल अभिलेखपुलकेशिन द्वितीयहर्ष एवं पुलकेशिन द्वितीय के युद्ध का विवरण
भीतरी स्तंभ लेखस्कंदगुप्तइसके जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं के बारे में
मंदसौर अभिलेखमालवा नरेश यशोधर्मनसैनिक की उपलब्धियों की जानकारी
  • गैर- सरकारी लेखों के यवन राजदूत हेलियोडोरस का वेसनगर (विदिशा) से प्राप्त गरूड़ स्तंभ लेख विशेष रूप से उल्लेखऩीय है, जिसके माध्यम से द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व में मध्य भारत में भागवत धर्म विकसित होने का प्रमाण मिलता है। अभिलेखों के अध्ययन को ‘एपिग्रेफी’ कहा जाता है।

History of Ancient India in Hindi

सिंधु घाटी की सभ्यता ” Indus Valley Civilization “ का विस्तार अवधि 2500-1750 ई.पूर्व हुआ। सर्वप्रथम 1921 ई.में रायबहादुर दयाराम साहनी ने हड़प्पा नामक स्थान पर इसके अवशेष की खोज की। इस सभ्यता का विस्तार पंजाबसिंधबलूचिस्तान,गुजरातराजस्थानजम्मू और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक था। इस सिंधु घाटी की महत्वपूर्ण विशेषता नगर योजना थी।

सैन्धव निवासियों के जीवन का मुख्य उद्यम कृषि कर्म था और प्रमुख खाद्यान गेहूं तथा जौ थे। उद्योग और व्यापार अर्थव्यवस्था के प्रमुख आधार थे। वस्त्र निर्माणधातु निर्माण उद्योगआभूषण निर्माण उद्योगबर्तन निर्माण उद्योगहिथायार -औजार निर्माण व परिवहन उद्योग सबसे प्रचलित थे। मातृ -देवी के संप्रदाय का सैन्धव – संस्कृति में प्रमुख स्थान था और यहाँ पर पशुपतिनाथमहादेवलिंगयौनिवृक्षों व पशुओं की पूजा की जाती थी।

बैल को पशुपालन का वाहन माना जाता था। फाख्ता एक पवित्र माना जाता था और ऐसा माना जाता है कि स्वास्तिक चिन्ह हड़प्पा सभ्यता की ही देन है। यह सभ्यता लगभग 1000 साल रही। इनका अंत जलवायु परिवर्तननदियों के जलमार्ग में परिवर्तनआर्यों का आक्रामण, बाढ़सामाजिक ढ़ांचे में बिखरावभुकंप आदि के कारण हुआ है। कालांतर में सर जॉन मार्शलमाधव स्वरूप वत्स,के.एन.दीक्षितअर्नेस्ट मैकेऑरेल स्टेइन आदि जैसे विद्वानों ने उत्खनन करके महत्वपूर्ण सामाग्रियां प्राप्त की।

वैदिक सभ्यता – प्राचीन भारत का इतिहास

सैंधव सभ्यता Saintha civilization के पश्चात भारत में जिस सभ्यता का उगम हुआ उसे वैदिक सभ्यता Vedic civilization अथवा Aryan civilization के नाम से जाना जाता है। आर्य सभ्यता का ज्ञान वेदों से होता है, जिसमें ऋगवेद सर्वप्राचीन होने के कारण सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं। सामान्यत: ऐसा माना गया है कि आर्यों ने ही सैंधव सभ्यता के नगरों को धवस्त किया और एक नयी सभ्यता की नींव रखी। लेकिन अभी भी इसके कोई ठोस साक्ष्य न होने के कारण इसे सिर्फ एक कल्पना ही माना जाता है।

वैदिक सभ्यता भारत की प्राचीन सभ्यता है, जिसमें वैदों की रचना हुई। वैदिक शब्द से ही वेद शब्द की उत्पति हुई है, जिसका अर्थ है – ज्ञान। वैदिक संस्कृति के निर्माता आर्य हैं। वैदिक संस्कृति में आर्य शब्द का अर्थ – श्रेष्ठ, उत्तम, अभिजात, कुलीन तथा उत्कृष्ट होता है। सर्वप्रथम मैक्समूलर ने 1853 ई. में आर्य शब्द का प्रयोग एक श्रेष्ठ जाति के आशय से किया था। आर्यों की भाषा संस्कृत थी।

अध्ययन की सुविधा के लिए वैदिक संस्कृति को दो भागों में बांटा गया हैं –

1)      ऋगवैदिक काल (1500-1000 ई.पू)

2)      उत्तर वैदिक काल (1000- 600 ई.पू)

ऋगवैदिक काल (1500-1000 ई.पू)

  • इस काल का तिथि निर्धारण जितना विवादास्पद रहा है, उतना ही इस काल के लोगों के बारे में सटकी जानकारी प्राप्त करना। ऋगवेद संहिता की रचना इसी काल में हुई थी। अत: यह इस काल की जानकारी का एकमात्र साहित्यिक स्त्रोत है।
  • सिंधु सभ्यता के विपरीत वैदिक सभ्यता मूलत:ग्रामीण थी। आर्यों का आरंभिक जीवन पशु चारण पर आधारित था। कृषि उनका मुख्य जीवनयापन का जरिया था। प्राचीन भारत का इतिहास
  • 1400.ई. पू के बोगजकोई (एशिया माइनर) के अभिलेख में ऋगवैदिक काल के देवताओं – इंद्र, वरूण, मित्र तथा नासत्य का उल्लेख मिलता है। इससे अनुमान लगाया जाता है कि वैदिक आर्य ईरान से होकर भारत आए होंगे।
  • ऋगवेद की अनेक बातें ईरानी भाषा के प्राचीनतम ग्रंथ अवेस्ता से मिलती -जुलती हैं।
नोट- संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक औऱ सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्कों) द्वारा ‘ऋगवेद’ को विश्व मानव धरोहर के साहित्य में शामिल किया गया है।

 

महाजनपदों का उदय – Prachin Bharat Ka Itihaas

आर्य जातियों के परस्पर विलीनकरण से जनपदों का विस्तार हुआ औऱ महाजनपद बने। महाजनपदों ने अब ईसा पूर्व छठी सदी में राज्य विस्तार किया। इसके साथ ही कला – कौशल की अभूतपूर्व अभिवृद्धि, धन-धान्य की समृद्धि, व्यापार – वाणिज्य का चमत्कार पूर्ण उत्कर्ष सामने आया। यही कारण है कि भारत के राजनैतिक इतिहास का प्रारंभ छठी शताब्दी ई.पू से माना जाता है।

छठी शताब्दी के आसपास पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार में लोहे के व्यापक प्रयोग के कारण अतिरिक्त उपज होने लगी तथा आर्थिक परिवर्तन हुए, जिसके कारण व्यापार, एवं वाणिज्य को बल मिला। लोहे के हथियारों के प्रयोग से क्षत्रिय वर्ग की शक्ति में अपार वृद्धि हुई। इन परिवर्तनों के कारण ऋगवैदिक कबीलाई जनजीवन में दरार पड़ने लगी औऱ क्षेत्रीय भावना के जाग्रत होने से नगरों का निर्माण होने लगा। परिणामत: उत्तर वैदिक काल के जनपद, महाजनपदों में परिवर्तित हो गए।

महाजनपदों की कुल संख्या 16 थी। जिसका उल्लेख बौद्ध ग्रंथ के ‘अंगुत्तर निकाय’ महावस्तु एवं जैन ग्रंथ भगवती सूत्र में मिलता है। इनमें मगध, कौशल, वत्स और अवंति सर्वाधिक शक्तिशाली थे। सोलह महाजनपदों में अश्मक ही एक ऐसा जनपद था जो दक्षिण भारत में गोदावरी नदी के किनारे स्थित था। इन 16 महाजनपदों में वज्जि एवं मल्ल में गणतंत्रात्मक व्यवस्था थी, जबकि शेष में राजतंत्रात्मक व्यवस्था थी। महापरिनिर्वाणसुत्त में 6 महानगरों की सूचना मिलती है – चंपा, राजगृह, श्रावस्ती, काशी, कौशांबी तथा साकेत। इस काल में मगध ने अन्य महाजनपदों को जीतकर मगध साम्राज्य का निर्माण किया।

सातवाहन युग का आरंभ प्राचीन भारत

ऐसा कहा जाता है कि सातवाहन राजवंश की स्थापना भारत में 230 बीसी के लगभग हुई और आंध्रा प्रदेश में धरानिकोटा औऱ अमरावती से महाराष्ट्र में जुन्नार औऱ प्रतिष्ठान तक इसने अपना विस्तार किया। यह भी कहा जाता है कि इसने लगभग 450 साल तक राज किया। वास्तव में सातवाहन ने मौर्य साम्राज्य के दास के तौर पर शुरूआत की औऱ इनके पतन के बाद दक्षिण भारत में स्वाधीन साम्राज्य के रूप में उभरा।

इन्होंने सांस्कृतिक पुल का निर्माण किया औऱ व्यापार की विस्तार के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस साम्राज्य ने भारतीय राज्यों के उनके शासकों की छवि के साथ वाले सिक्के जारी किए। अपने विचारों तथा संस्कृति को इंडो गंगा के मैदान से भारत के दक्षिण के सिरे तक आदान-प्रदान का रास्ता खोला। सातवाहन के लोग खेती और लोहे के बारे में बेहतर जानकारी रखते थे।

सामाजिक संगठन

सातवाहन साम्राज्य का समाज चार वर्गों के अस्तित्व को दर्शाता है :

  • प्रथम वर्ग उन लोगों से बना है जो जिलों का देखरेख और नियंत्रण करते थे
  • द्वितीय वर्ग अधिकारियों से बना था ।
  • तीसरा वर्ग में  किसान और वैद्यों आते थे ।
  • चौथे वर्ग में आम नागरिक आते थे।

परिवार का मुखिया गृहपति था।

प्रशासन का स्वरूप

यहाँ का साम्राज्य पांच प्रान्तों में विभक्त था। नासिक के प्रश्चिमी प्रांत पर अभिरस का शासन, पूर्वी प्रांत यानि की कृष्ण- गुंटूर में इक्ष्वाकू का शासन था। चौतस ने दक्षिण पश्चिमी भाग पर कब्जा कर अपने साम्राज्य का उत्तर और पूर्व तक विस्तार किया। पहलाव का शासन दक्षिण पूर्वी भाग पर था।

इनके शासन में अधिकारियों को आमात्य और महामंत्र के रूप में जाना जाता था। सेनापति प्रांतीय राज्यपाल हुआ करता था। गौल्मिका के पास सैन्य पलटनों की जिम्मेदारी होती थी, जिसमें 9 हाथी, 9 रथ, 25 घोड़े औऱ 45 पैदल सैनिक शामिल थे। सातवाहन साम्राज्य में तीन दर्जे के सामंत हुआ करते थे। सबसे उच्च पर राजा का दर्जा होता था जिसके पास सिक्के छापने का पूर्ण रूप से अधिकार होता था। दूसरे नबंर पर महाभोज व तीसरे नबंर पर सेनापति का स्थान होता था। इ

सातवाहन राज्य में धर्म से संबंधित गतिविधियां:

सातवाहन शासन में सबसे ज्यादा प्रचलित धर्म बौद्ध तथा ब्राह्रमण थे। लोगों के बीच विभिन्न धर्मों के प्रति आस्था व निष्ठा थी।

वास्तुकला

सातवाहन के शासन के दौरान, चैत्य और विहार बड़ी महीनता के साथ ठोस चट्टानों से काटे गए। चैत्य बौद्ध के मंदिर थे और मोनास्ट्री को विहार के नाम से भी जाना जाता था। सबसे प्रसिद्ध चैत्य पश्चिमी दक्कन के नाशिक, करले इत्यादि में स्थित है। इस समय में चट्टानों से काटकर बनाया गया वास्तुशिल्प भी मौजूद था।

भाषा

सातवाहन के शासकों ने दस्तावेज़ों पर आधिकारिक भाषा के रूप में प्राकृत भाषा का इस्तेमाल किया। सभी अभिलेखों को प्राकृत भाषा में बनाया गया और ब्रहमी लिपि में लिखा गया।

महत्व और पतन

सातवाहन ने अपना साम्राज्य को स्थापित करने के लिए शुंग औऱ मगध के कनव के साथ मुकाबला किया। जिसके बाद भारत के बहुत बड़े हिस्से को विदेशी आक्रमणकारियों जैसे कि पहलाव, शक और यवना से बचाने के लिए एक बड़ी भूमिक अदा की। गौतमीपुत्र सत्कर्णी और श्री यजना सत्कर्णी इस राजवंश के कुछ प्रमुख शासक थे।

मगध का साम्राज्य

भारत देश पर 684 बीसी से लेकर 320 बीसी तक मगधों का शासन था। इनके बारे में रामयाण व महाभारत जैसे महान काव्य में भी उल्लेख किया गया है। इसमें हर्यंका राजवंश, शिशुनाग राजवंश औऱ नन्दा राजवंश थे।

हर्यंका राजवंश में तीन महत्वपूर्ण राजा थे-

  • बिंबिसार
  • अजातशत्रु
  • उदयीन

बिंबिसार  (546-494 बीसी)

बिंबिसार का शासन 544 बीसी से लेकर 492 बीसी तक रहा यानि कि तकरीबन 52 साल तक। लेकिन बिंबिसार के पुत्र ने अजातशत्रु ने बंदी बना कर हत्या कर दी थी। अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए इसने वैवाहिक गठबंधन किया। इसका पहला विवाह कोशल परिवार की महिला कोशल देवी से हुआ था। जिसके बाद इसे दहेज में काशी प्रांत दिया गया।

इसके बाद बिबिंसार ने वैशाली स्थित लिच्छवि परिवार की राजकुमारी चेल्लाना से विवाह किया औऱ इस वैवाहिक गठबंधन की सहायता से इसने उत्तरी सीमा पर अपना शासन सुरक्षित किया। बिंबिसार ने तीसरा विवाह मध्य पंजाब के मद्रा के शाही परिवार की खेमा से किया। अंग के ब्रहमदत्ता को पराजित कर बिबिंसार ने उसके साम्राज्य को हथिया लिया था। अंवती राज्य के साथ बिंबिसार के संबंध काफी अच्छे व प्रचलित थे।

प्राचीन भारत का History Hindi Me

अजातशत्रु (494 -462 बीसी)

अजातुशत्रु ने अपने पिता बिबिंसार की हत्या कर उसके राज्य पर कब्जा कर लिया। अजातशत्रु अपनी आक्रमक नीतियों के लिए जाना जाता था। इसी नीति ने उसे काशी औऱ कौशल की तरफ धकेल दिया। जिसके बाद मगध और कौशल के बीच लंबी अंशाति का महौल बन गया जिसे खत्म करने के लिए कौशल के राजा को मजबूरन अपनी बेटी का विवाह अजातशत्रु से करना पड़ा औऱ उसे काशी भी दे दिया। 16 साल तक वैशाली के लिच्छवियों के खिलाफ युद्ध लड़ वैशाली गणराज्य पर भी अजातशत्रु ने जीत हासिल की।

शुरुआत में वह जैन धर्म का अनुयायी था पर बाद में उसने बौद्ध धर्म को अपनाना शुरू कर दिया। जातशत्रु ने कहा कि वह गौतम बुद्ध से मिला था। यह दृश्य बरहुत की मूर्तियों में दिखाया गया है। इसने कई  चैत्यों  और विहारों  का निर्माण करवाया। ऐसा कहा जाता है कि वह बौद्ध की मृत्यु के बाद राजगृह में प्रथम बौद्ध परिषद में भी था।

उदयीन

उदयीन, अजातशत्रु का उत्तराधिकारी बना। इसने पाटलीपुत्र की नींव राखी और राजधानी को राजगृह से पाटलीपुत्र स्थानत्रित किया।

नाग –दसक हर्यंका राजवंश का अंतिम शासक था। इसे लोगों द्वारा शासन करने के लिए अयोग्य पाया गया और उसे अपने मंत्री शिशुनाग के लिए राजगद्दी से हाथ पीछे खींचना पड़ा।

शिशुनाग राजवंश

शिशुनाग के शासन के दौरान अवन्ती  राज्य को जीत लिया गया और मगध साम्राज्य के कब्जे में लिया गया। शिशुनाग का उत्तराधिकारी कालाशोक बना। उसने 383 BC में वैशाली में दूसरी बौद्ध परिषद बुलाई।

नन्दा राजवंश

नन्दा राजवंश के संस्थापक महापद्म के द्वारा शिशुनाग राजवंश के अंतिम राजा का तख़्ता पलट कर दिया गया  था।

इसे सर्वक्षत्रांतक (पुराण ) और उग्रसेना (एक बड़ी सेना का स्वामी ) के नाम से भी जाना गया । महापद्म को पुराण में  एक्राट (एकमात्र सम्राट) के नाम से भी जाना गया। यहाँ तक कि इसे भारतीय इतिहास में पहला साम्राज्य निर्माता के तौर पर जाना गया है | धन नन्द, नन्दा राजवंश का अंतिम शासक था। इसे यूनानी पुस्तकों में अग्राम्मेस या क्षाण्ड्रेमेस भी कहा गया। इसके शासन काल के दौरान अलेक्जेंडर ने भारत पर आक्रमण किया था।

निष्कर्ष

धन नन्दा का तख़्ता पलट चन्द्र गुप्त मौर्य द्वारा 322 BC में किया गया जिसने मगध के नए शासन की स्थापना की जिसे मौर्य राजवंश के नाम से जाना गया |

कनिष्क: कुषाण राजवंश (78 ईस्वी – 103 ईस्वी)

कनिष्क कुषाण साम्राज्य का सबसे शक्तिशाली शासक था। उसके साम्राज्य की राजधानी पुरूषपुर (पेशावर) थी। उसके शासन के दौरान, कुषाण साम्राज्य उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान से लेकर मथुरा और कश्मीर तक फैल गया था। रबातक शिलालेख से प्राप्त जानकारी के अनुसार कनिष्क विम कदफिसेस का उत्तराधिकारी था जिसने कुषाण राजाओं की एक प्रभावशाली वंशावली स्थापित की।

कनिष्क साम्राज्य का विस्तार:

कनिष्क साम्राज्य निश्चित रूप से बहुत बड़ा था। यह दक्षिणी उज्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान से उत्तर पश्चिम में अमू दरिया के उत्तर (ऑक्सस) से पश्चिम पाकिस्तान और उत्तरी भारत के साथ-साथ दक्षिण पूर्व में मथुरा (रबातक शिलालेख में यहां तक दावा किया गया है कि उसने पाटलिपुत्र और श्री चंपा को संघटित कर लिया था) तक फैल गया था और कश्मीर को भी अपने अधिकार क्षेत्र में शामिल कर लिया था जहां कनिष्कपुर नाम का एक शहर था। उसके नाम से बारामूला दर्रा ज्यादा दूर नहीं था जिसमें अभी भी एक बड़े स्तूप का आधार मौजूद है।

मध्य एशियाई संपर्कों का प्रभाव (शक-कुषाण काल के दौरान)

इस काल में सेना के घुड़सवार का शानदार व बेहतरीन तरीके से उपयोग देखने को मिला। घोड़े की पीट का उपयोग सीट के रूप में करना औऱ घोड़े की लगाम की शुरूआत इसी शासन काल में हुयी। इसके अलावा इस कालखँड में अंगरखा, पगड़ी औऱ पतलून तथा भारी-भरकम लंबे कोट, कैप, हेलमेट व जूतों के प्रयोग की शुरूआत भी हुयी। जो युद्ध के लिए काफी मददगार साबित हुए। शक – कुषाण कालखंड में समुद्र औऱ घाटियों के मार्गों को व्यापार करने के लिए शुरू कर दिया गया था।

शक और कुषाण अवधि के दौरान घुड़सवार सेना का बेहतरीन उपयोग देखने को मिला था। घोड़े  की लगाम और पीठ पर सीट के प्रयोग की शुरूआत शकों और कुषाणों द्वारा शुरू की गयी थी। इसके अलावा, शक और कुषाणों ने अंगरखापगड़ी और पतलून तथा भारी-भरकम लंबे कोटकैपहेलमेट की भी शुरूआत की गयी थी और इस अवधि के दौरान जूतों की भी शुरूआत हुई थी जो युद्ध में जीत के लिए मददगार साबित हुए थे।

मौर्य युग के पूर्व विदेशी आक्रमण

इतिहासकारों की माने तो भारत पर पहला विदेशी आक्रमण करने का असफल प्रयास 550 ईसा पूर्व में ईरान के सम्राट सायरस द्वारा किया गया था लेकिन पहला सफल विदेशी आक्रमण डेरियस या दारा द्वारा 518 ईसा पूर्व किया गया।

इस काल खंड में दो आक्रमण मुख्य थे –

1 हखामनी ईरानी आक्रमण व 2 यूनानी आक्रमण

ईरानी/फारसी आक्रमण

पूर्वोत्तर भारत में धीरे-धीरे छोटे गणराज्यों और रियासतों का विलय मगध साम्राज्य के साथ कर दिया था। लेकिन उत्तर-पश्चिम भारत में विदेशी आक्रमण से क्षेत्र की रक्षा करने के लिए कोई भी मजबूत साम्राज्य नहीं था। यह क्षेत्र धनवान भी था और इसमें हिंदू कुश के माध्यम से आसानी से प्रवेश किया जा सकता था।

518 ई.पू. में ईरानी आक्रमण और 326 ई.पू. में मकदूनियाई आक्रमण के रूप में  भारतीय उप-महाद्वीप के दो प्रमुख विदेशी आक्रमण हुए थे। आर्कमेनियन शासक डारियस प्रथम ने 518 ईसा पूर्व में भारत के उत्तर-पश्चिम सीमांत पर आक्रमण किया और राजनीतिक एकता के अभाव का लाभ लेते हुए पंजाब पर आक्रमण कर दिया।

ईरानी आक्रमण के प्रभाव

  • आक्रमण से इंडो-ईरानी व्यापार और वाणिज्य में वृद्धि हुई।
  • ईरानियों ने भारतीयों के लिए एक नई लेखन लिपि की शुरूआत की जिस खरोष्ठी के रूप में जाना जाता था।
मकदूनियाई/ सिकंदर के आक्रमण

सिकंदर 20 साल की उम्र में अपने पिता की जगह लेते हुए मैसेडोनिया के सिंहासन आसीन हुआ। उसका सपना विश्व विजेता बनने का था और 326 ईसा पूर्व भारत पर आक्रमण करने से पहले उसने कई क्षेत्रों पर विजय प्राप्त कर ली थी। अम्भी (तक्षशिला के शासक) और अभिसार ने उसके आगे आत्मसमर्पण कर दिया था लेकिन पंजाब के शासक ने ऐसा करने से मना कर दिया था।

सिकंदर और पोरस की सेनाओं के बीच झेलम नदी के पास शुरू हुए युद्ध को हेडास्पेस के युद्ध के नाम से जाना जाता है। हांलाकि इस युद्ध में पोरस हार गया था लेकिन सिकन्दर ने उसका उदारतापूर्वक व्यवहार किया था। हालांकि, यह जीत भारत में उसकी आखिरी बड़ी जीत साबित हुई क्योंकि उसकी सेना ने इसके बाद आगे जाने से इनकार कर दिया था। वे सिकंदर के अभियान के साथ जाने से काफी थक गए थे और वापस घर लौटना चाहते थे।

इसके अलावा, मगधियन साम्राज्य (नंदा शासक) की ताकत से भी वो भयभीत थे। विजय प्राप्त प्रदेशों के लिए आवश्यक प्रशासनिक व्यवस्था करने के बाद सिकंदर 325 ईसा पूर्व वापस चले गया। 33 वर्ष की आयु में जब वह बेबीलोन में था तब उसका निधन हो गया।

आक्रमण के प्रभाव

  • इस आक्रमण से भारत में राजनीतिक एकता की जरूरत महसूस की गयी जिससे चंद्रगुप्त मौर्य और उसके वंश का उदय हुआ है जिन्होंनो अपने शासन के दौरान भारत को एकजुट किया।
  • सिकंदर के आक्रमण के परिणामस्वरूप, भारत में इंडो-बैक्टेरियन और इंडो-पर्थिनयन राज्य स्थापित किये गये  जिसने  भारतीय वास्तुकला, सिक्कों और खगोल विज्ञान को प्रभावित किया था।

निष्कर्ष: व्यापार, वाणिज्य, कला और संस्कृति के विकास साथ विदेशी आक्रमणों ने भारतीय उपमहाद्वीप के राजनीतिक एकीकरण में मदद की।

मोर्य समाज और इसका पतन

इतिहास के अनुसार अशोक की मृत्यु के बादे से ही मौर्य वंश के पतन में तेजी से कमी आ गयी है। इसका पहला मुख्य कारण था कमजोर राजाओं का उत्तराधिकार प्राप्त करना तथा दूसरा साम्राज्य का दो भागों में विभाजित होना। इस बंटवारे के कारण ही ऐसा कहा जाता है कि यूनानी आक्रमण हुआ था, जिसे मौर्य रोक नहीं पाए थे। इस साम्राज्य का अंतिम राजा बृहद्रथ जिसकी हत्या सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने की थी।

मौर्य समाज के पतन के कारण

  • अशोक-की धार्मिक नीति उसके कार्यकाल में ब्राह्मण विरोधी हुआ करती थी। ऐसा कहा जाता है कि अशोक ने वशुवध पर रोक लगा दी थी जिससे ब्राह्मणों की आय प्रभावित हुई थी।
  • वित्तीय संकट भी एक कारण था। कहा जाता है सेना औऱ नौकरशाही के निर्वहन के साथ – साथ बौद्ध भिक्षुओं पर भी अशोक- ने भारी खर्च किए था।
  • मगध साम्राज्य में प्रांतीय शासक व नौकरशाह भ्रष्ट व दमनकारी थे। जिससे लोगों के बीच में लगातार विद्रोह बढता गया। कई तरह के उपायो के बाद भी प्रांतो में उत्पीड़न की जांच में असफल रहे थे।
  • अशोक, हमारी धार्मिक-गतिविधियों को आगे ले जाने में इतना व्यस्त था कि शायद ही कभी उसने मौर्य साम्राज्य के उत्तर-पश्चिम सीमांत की ओर ध्यान दिया था। और इसका फायदा यूनानियों ने उठाया तथा उत्तरी अफगानिस्तान में एक राज्य की स्थापना कर दी जिसे बैक्ट्रिया के रूप में जाना जाता था। इसके बाद कई विदेशी आक्रमण हुए जिससे साम्राज्य कमजोर हो गया था।

अशोक द ग्रेटअशोक द ग्रेट के लिए कहा जाता है कि अशोक के राजगद्दी पर पद ग्रहण करने तथा वास्तविक राज्यभिषेक में चार साल का अंतर था। इसलिए उपलब्ध साक्ष्यों से हम यूं कह सकते हैं कि अशोक ने बिंदुसार की मृत्यु के बाद राजगद्दी हासिल करने में बड़ा संघर्ष किया होगा। अशोक बिंदुसार का बेटा था। अपने पिता के कार्यकाल में वह तक्षशिला व उज्जैन का राज्यपाल था। 268 बीसी में उसने भाईयों को हरा कर सत्ता हासिल की थी।

अशोक से जुड़ी कुछ मुथ्य बातें –
  • अपने शासन के 9 वें साल में अशोक ने कलिंग पर जीत हासिल की थी। इस समय का उड़ीसा तब का कलिंग था। कहा जाता है कि कलिंग के युद्ध कौशल को देखते हुए अशोक ने हमला किया था व यह एक भयावह युद्ध था, जिसमें 1.5 लाख लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे तो वहीं कई हजार लोग मारे गए थे।
  • जानवरो के प्रति सहानुभूति दिखा कर जियो व जीने दो का मंत्र दिया। अशोक ही था जिसने देश मे राजनीतिक एकीकरण लाया। हर एक धर्म, एक भाषा तथा व्यवहारिक दृष्टि से एक लिपि जिसे ब्रहमी कहा गया व इसका इस्तेमाल अशोक के अभिलेख में भी किया गया है।
  • अशोक ने शांति व सत्ता बनाए रखने के लिए बेहद ही विशाल व शक्तिशाली सेना स्थापित की। विश्व में एशिया – यूरोप के अन्य राज्यों तथा बौद्ध धर्म मंडलों से अपने रिस्ते बनाए।
  • अशोक की मृत्यु – अशोक की मृत्यु 40 साल के शासन के बाद 232 बीसी में हुई। यह माना गया है कि इसकी मृत्यु के बाद इसका साम्राज्य पश्चिमी तथा पूर्वी हिस्से में  विभाजित हो गया पूर्वी हिस्से पर अशोक के पोते दसरथ ने शासन किया जबकि पश्चिमी हिस्से को संप्रति ने संभाला। उसके साम्राज्य का विस्तार 265 बीसी. में काफी बड़ा था।
गुप्त काल के बाद (750 ई. पू. तक)

5वीं शताब्दी के अंत के दौरान गुप्त साम्राज्य का बिखराव शुरू हो गया था। शाही गुप्तों के समाप्त होने के साथ साथ मगध और इसकी राजधानी पाटलिपुत्र ने भी अपना महत्व खो दिया था। इसलिए, गुप्त काल के बाद की अवधि प्राकृतिक लिहाज से बहुत अशांत थी। गुप्तों के पतन के बाद उत्तर भारत में पांच प्रमुख शक्तियां फैल गयी थी। ये शक्तियां निम्नवत् थी:

हूणहूण मध्य एशिया की वह दुर्लभ प्रजाति थी जिसका आगमन भारत में हुआ था। कुमारगुप्त के शासनकाल के दौरान, हूणों ने पहली बार भारत पर आक्रमण किया था। हालांकि, कुमारगुप्त और स्कन्दगुप्त राजवंश के दौरान वे भारत में प्रवेश करने में सफल नहीं हो सके थे। हूणों ने तीस साल की एक बेहद ही कम अवधि के लिए भारत पर राज किया था। हूणों का वर्चस्व उत्तर भारत में स्थापित हुआ था। तोरामन उनका एक सर्वश्रेष्ठ शासक था जबकि मिहिरकुल सबसे शक्तिशाली और सुसंस्कृत शासक था।

मौखरिपश्चिमी उत्तर प्रदेश में कन्नौज के आसपास के क्षेत्र पर मौखरियों का कब्जा था। उन्होंने मगध के कुछ हिस्से पर भी विजय प्राप्त की थी। धीरे-धीरे उन्होंने बाद में गुप्तों को सत्ताविहीन कर दिया और उन्हें मालवा जाने के लिए मजबूर कर दिया।

इतिहास प्राचीन भारत की हिंदी में

मैत्रकशायद अधिकांश मैत्रक ईरानी मूल के थे और वल्लभी के रूप में राजधानी के साथ गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में शासन किया। भटरक के मार्गदर्शन में वल्लभी शिक्षा, संस्कृति और व्यापार तथा वाणिज्य का केंद्र बन गयी थी। इसने सबसे लंबे समय तक अरबों से रक्षा की थी।

पुष्यभूति: थानेश्वर (दिल्ली का उत्तरी भाग) पुष्यभूति की राजधानी थी। प्रभाकर वर्धन इस वंश का सबसे विशिष्ट शासक था जिसने परम भट्टारक महाराजाधिराज की पदवी धारण की थी। उसका मौखरियों के साथ एक वैवाहिक गठबंधन था। वैवाहिक गठबंधन ने दोनों साम्राज्यों को मजबूत बनाया था। हर्षवर्धन इसी गोत्र से संबंध रखते थे।

गौड: गौड़ों ने बंगाल के एक क्षेत्र पर शासन किया और बांकि चार साम्राज्य काफी कम प्रसिद्ध थे। शशांक इनका सबसे शक्तिशाली और महत्वाकांक्षी शासक था। उसने मौखरियों पर आक्रमण कर ग्रहवर्मन की हत्या कर दी थी तथा राज्यश्री को हिरासत में ले लिया था।

दिल्ली में गुलाम वंश

कुतब-उद-दीन ऐबक, मुहम्मद गौरी के सिपाहसालार के साथ उसका ग़ुलाम भी था। कुतब -उद-दीन ऐबक का जन्म मध्य एशिया के तुर्की परिवार में हुआ था और उसे बचपन में ही ग़ुलाम के तौर पर बेच दिया गया था। सुल्तान मुहम्मद गौरी के राजपाल होने के कारण कुतब-उद-दीन ने बनारस को 1194 एडी में बर्खास्त कर दिया। इसने अजमेर के राजा को भी हराया व इसने ग्वालियर पर विजय प्राप्त करने के बाद राजा सोलंखोल से ज़बरदस्ती शुल्क अदा करवाया। इसके अलावा, इसने गुजरात के राज्यों पर भी विजय हासिल की |

इल्तुत्मिश, कुतब-उद-दीन ऐबक (1206-11) का उत्तराधिकारी बना जिसके बाद रज़िया (1236-40) और बलबन (1265-85) ने राजभार संभाला।  कुतब-उद-दीन ऐबक ने क़ुतुब मीनार की नींव रखी परंतु इल्तुत्मिश ने इसे पूरा कराया था। चौगान खेलने के दौरान अपने घोड़े से गिरने के कारण कुतब-उद-दीन की मृत्यु हो गई।

1206 एडी में मुहम्मद गौरी की हत्या के बाद, कुतब-उद-दीन ऐबक भारत का सुल्तान बन गया और ममेलुक वंश या दास वंश परंपरा की नींव रखी। 1206 एडी में इसे मुहम्मद गौरी के द्वारा नैब-उस-सल्तनत (गौरी के भारतीय साम्राज्य के राजपाल) के तौर पर नियुक्त कर दिया |

प्राचीन भारत की हिस्ट्री

समाज का अवलोकनगुप्त काल के बाद भारतीय समाज में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। पांचवीं सदी ईस्वी के बाद से भारत में भूमि अनुदान ने सामंती विकास में मदद की। किसान सामंती अधिपतियों के लिए दी गई भूमि में रुके ठहरे रहे थे। इनमें जिन गांवो को स्थानांतरित कर दिया गया था उन्हें ‘स्थान-जन-सहिता’ और ‘समरिद्धा’ के नाम से जाना जाता था। गुप्त काल के बाद की अवधि में व्यापार और वाणिज्य में गिरावट के कारण वहां की अर्थव्यस्था एक बंद अर्थव्यवस्था में तब्दील हो चुकी थी।

सामंती समाज के विकास ने राजा की स्थिति कमजोर कर दी थी जिस कारण राजा को सामंती प्रमुखों पर ज्यादा अधिक निर्भर रहना पडता था। सामंती प्रमुखों का वर्चस्व बढ़ने लगा था जिसके परिणामस्वरूप गांव का स्वशासन कमजोर हो गया था।

ह्वेनसांग के लेखन में उल्लेखित चार वर्ण समाज में मौजूद थे। उस कई उप जातियां भी मौजूद थी जो उस समय और प्रबल हो गयीं थी। इस अवधि के दौरान महिलाओं की स्थिति बहुत बिगड़ गयी थी। सतीप्रथा और दहेजप्रथा आम हो गयी थी।

लड़कियों की शादी छह से आठ साल की उम्र के बीच होने लगी थी। सामान्य महिला पर विश्वास नहीं किया जाता था। उन्हे पृथक (अलग) रखा जाता था। आम तौर पर महिलाओं के जीवन को उनके पुरूष रिश्तेदारों जैसे- बेटे, पिता, और भाई द्वारा नियंत्रित किया जाता था।

अर्थव्यवस्था प्राचीन भारत का इतिहास

हर्ष शासन की अवधि के दौरान साहित्यिक और शिलालेखीय साक्ष्यों से पता चलता है कि राज्य कृषि, व्यापार और अर्थव्यवस्था में किस प्रकार उन्नत था। शुरूआती अरब लेखकों ने भी मिट्टी की उर्वरता और अमीर खेती का वर्णन किया है। साहित्यकार अभिधन रत्नमल ने उल्लेखित किया है मिट्टी को विभिन्न प्रकारों में जैसे उपजाऊ, बंजर, रेगिस्तान, उत्कृष्ट आदि के रूप में वर्गीकृत किया गया था। उन्होंने यह भी उल्लेखित किया है कि विभिन्न प्रकार के फसलों के लिए विभिन्न मैदानों का चयन किया जाता था।

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उद्योग के क्षेत्र में कपड़ा सबसे पुराने उदयोगों में से एक था।  समकालीन साहित्य में बुनकर, रंगरेज, दर्जी आदि के पेशे का वर्णन किया गया है। इस अवधि के दौरान धातु का काम भी बेहद लोकप्रिय था। धातु उद्योग के कुछ केन्द्र प्रसिद्ध थे। सौराष्ट्र अपने घंटी (बेल) धातु उद्योग के लिए प्रसिद्ध था जबकि वंगा (बंगाल) अपने टिन उद्योग के लिए जाना जाता था।

गुप्त काल के बाद दक्षिण पूर्व एशिया के साथ व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज हुयी थी। भारत के माध्यम से पूर्व और पश्चिम के बीच व्यापार के प्रवाह का उल्लेख अरब, चीनी और भारतीय स्त्रोतों में किया है। भारत, चंदन की लकड़ी, मोती, कपूर, कपास, धातु, कीमती और अर्द्ध कीमती पत्थरों का निर्यात करता था। आयातित वस्तुओं में किराए के घोड़े शामिल थे। घोड़ों को मध्य और पश्चिमी एशिया से आयात किया जाता था। गुप्त काल में श्राइन या निकाय महत्वपूर्ण होते थे। तो ये थी प्राचीन भारत का इतिहास के  में जानकारी.

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