मध्यकालीन भारत की क्षेत्रीय संस्कृति Regional Culture Of Medieval India: मध्यकालीनभारत की क्षेत्रीय सभ्यता अत्यंत सम्पन्न और सगुण रही है जिसने मध्यकालीन भारत के विशाल इतिहास को और भी गौरवपूर्ण बनाया जिसे आज हम क्षेत्रीय संस्कृति के तौर पर जानते है वो मूल रूप से अनेक नगरों की सभ्यताओं का सम्मिलित रूप हैं जो भारत के कई प्रान्तों से मिल कर बनी है।

मध्यकालीन भारत की क्षेत्रीय संस्कृति Regional Culture Of Medieval India

तो यहाँ हम जानेंगे मध्यकालीन भारत की क्षेत्रीय सभ्यताओं का अतुलनिलय इतिहास जिससे मिल कर भारतीय संस्कृति को भी एक अकल्पनीय मुकाम तक पहुँचाया गया यहीँ कारण है की मध्यकालीन भारत की क्षेत्रीय संस्कृति का इतिहास (History of Regional Culture During Medieval India)इतनी अधिक महत्वता रखता है साथ ही साथ राष्ट्र विख्यात ही नहीं बल्कि विश्व विख्यात है।

मध्यकालीन भारत की क्षेत्रीय संस्कृति

केरला: चेरा और मलयालम Kerala: Cheras and Malayalam

महोदयपुरम का चेरा साम्राजय की स्थापना 9वीं शताब्दी में केरला के दक्षिणी पश्चिम इलाके में हुई थी उस दौरान इस क्षेत्र में मलयालम (Malayalam)  बोली जाती थी उस काल मे सम्राटों ने अपने शिलालेखों (Inscription) में मलयालम भाषा का प्रयोग किया।

और ऐसा माना जाता है की यहीं से क्षेत्रीय भाषा औपचारिक रूप से सभ्यता के सृजन में उपयोग होने लगा इस काल मे ही चेरा साम्राजय ने अपनी परम्पराओं में संस्कृत भाषा को शामिल किया जिसका मुख्य उदाहरण लीलातिलकम (Lilatilkam) बना जो 14 वीं शताब्दी में लिखा गया जिसने मध्यकालीन भारत की प्राचीनतम संस्कृति को और भी सुंदर बना दिया।

Regional Culture Of Medieval India in hindi

ओरिसा: जगन्नाथ पंथ Orissa: Jagannatha Cult

मध्यकालीन भारत के इतिहास में कुछ हिस्सों में क्षेत्रीय संस्कृति Regional Culture क्षेत्रीय परम्पराओं के आधार पर आगे बढ़ी जिसका मुख्य उदहारण है- ओरिसा का जगन्नाथ पंथ। जैसे जैसे इस मंदिर ने एक मुख्य दार्शनिक स्थल के तौर पर अपनी पहचान बनाई वैसे वैसे इसकी महत्वता सभी राजनैतिक और सामाजिक दायरों में उभरती गई।

इस मन्दिर पर मुग़ल, मराठा, ईस्ट इंडिया कंपनी (East India Company) ने अपना आधिपत्य जमाने का प्रयास किया क्योंकि वह जानते थे की इस अधिपत्य के द्वारा ही क्षेत्रीय जन पर राज सम्भव है।

राजस्थान: राजपूत Rajasthan: The Rajputs

राजपूतों को मुख्यतः राजस्थान की सभ्यता के लिए किए गए प्रयासों के लिए जाना जाता है। राजपूत सम्राट पृथ्वीराज चौहान (Prithviraj Chauhan) बहादुरी का प्रेरणा स्त्रोत बने जिन्होंने जीत के लिये अपने प्राणों का बलिदान दिया। साथ ही साथ इस सभ्यता को महिलाओं ने भी सती बन अग्रसर किया।

मध्यकालीन भारत की क्षेत्रीय सभ्यता

नृत्य की सभ्यताCulture of Dance

नृत्य की सभ्यता की नींव कथक (Kathak) ने रखी। कथक एक नृत्य शैली है जो मूलतः उत्तर भारत के मंदिरों से जुड़ाव रखती है। 15 वीं और 16 वी शताब्दी में भक्ति काल की शुरुआत के साथ कथक एक प्रचलित नृत्य शैली बन गया। कथक मुख्यतः राधा-कृष्ण को समर्पित किया जाता है।

मुग़ल काल के दौरान कथक का इतिहास निर्माण शुरू हुआ और आज भी कथक अतुलनिलय अस्तित्व में है। 19 वी शताब्दी के मध्य में अंग्रेजों द्वारा कथक का विरोध भी किया गया लेकिन भारत की स्वतंत्रता के पश्चात कथक को भारत के सर्वोच्च नृत्य शैलीयों में से एक माना जाने लगा।उसके अलावा मध्यकालीन भारत की क्षेत्रीय संस्कृति (Regional Culture) को- कुचिपुड़ी, भरतनाट्यम, बिहू ने आगे बढ़ाया।

चित्रकला की सभयता Culture of Painting

चित्रकला (Painting) को सर्व प्रथम रंगों और ब्रश ले द्वारा कागज़ या कपड़े पर उतारा गया। इनके मुख्य उदाहरण दक्षिण भारत के जैन धर्म मे देखने को मिलते है। मुगल काल के पथन के साथ साथ कई चित्रकारों को अलग होना पड़ा था। जिसका दुष्प्रभाव राजपूत और राजस्थान साम्राजय पर भी हुआ।

मध्यकालीन भारत के इतिहास में अनेक चित्रकारों (Painters) ने मुगल दरबारों और राजाओं की तस्वीरों का सृजन कार्य किया उसके बाद कंगरा चित्रकला विद्यालय की स्थापना हुई जहाँ की चित्रकला में  खूबसूरत रंगों के मेल की प्रधानता उपस्थित थीं।

साहित्य की सभ्यता Culture of literature

मध्यकालीन भारत के इतिहास में साहित्य (History of literature during Medieval India) का प्रारम्भ बंगाली (Bengali)भाषा से हुआ। ऐसा माना जाता है की बंगाली के कुछ शब्द संस्कृत से लिये गए है। 18 वीं शताब्दी की शुरुआत से बंगाल को पाल वंश के शासन काल मे क्षेत्रीय शासन का केंद्र बनाया गया।

15 वीं शताब्दी के दौरान बंगाल पर सुल्तानों का शासन रहा। 1586 मे जब अकबर (Akbar) ने बंगाल को जीत तो उन्होंने बंगाल सुबा का गठन किया। उस दौरान पारसी (Persian) राजनैतिक भाषा थी और बंगाली को क्षेत्रीय भाषा बनने का दर्जा प्राप्त हुआ।

बंगाली में संस्कृत के अलावा पारसी और युरोपियन (European) भाषा के भी शब्द शामिल है। बंगाली सहित्य (Literature) को हम 2 भाग में विभाजित कर सकते है – 1. संस्कृत में डूबा हुआ 2. संस्कृत से भिन्न। पहले भाग में संस्कृत भाषा के पौराणिक अवशेषों को अनुवादित किया गया जिसमें मंगलकाव्य (Mangal kavya) मुख्य है।। और दूसरे भाग में नाथ साहित्य की प्रधानता थी जिसमे मयनमती (Mayanmati) ओर गोपीचन्द्र (Gopi chandr)की कहानियाँ प्रमुख है।

मध्यकालीन भारत की बंगाली खान पान की सभ्यता Food habits of Bengali culture of Medieval India

बंगाली सभ्यता में खान-पान में चावल और मछली (Rice and Fish) मुख्य रूप से शामिल है। जो बंगालियों के प्रिय भोजन के रूप में भी जाना जाता है। परम्पराओं के अनुसार ब्राम्हण के लिए मांसाहारी (Non vegetarian) भोजन वर्जित है लेकिन इस प्रचलन के कारण बंगाली ब्राम्हणों ने भी इसको स्वीकार कर लिया है। साथ ही साथ 13 वीं शताब्दी में लिखे गए एक पौराणिक ग्रन्थ के अनुसार भी बंगाली ब्राम्हणों को यह अनुमति दी गई है।

मध्यकालीन भारत की पूजा की सभ्यता Culture Of preaching of Medieval India-

मध्यकालीन भारत के इतिहास में पुजारी वो लोग होते थे जो मन्दिरों भगवान की पूजन करते थे साथ ही साथ शिक्षक बन समाज को सीख भी देते थे। इसके अलावा पीर (pir) होते थे जो समुदाय के नेतृत्व करता भी माने जाते थे। प्राचीन काल मे जब परिस्थितियाँ अस्थिर हो जाती थी तो पीर के मार्गदर्शन में ही उन्हें सम्भाला जाता था पीर सूफी संतों (Sufi Saints)और अन्य धर्मों के  महात्माओं को भी कहा जाता था।

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पीर मुख्यतः दोचाल और चौचल में निवास करते थे। पीर और पुजारियों ने ही भारत के इतिहास को और भी आधारभूत संरचना में ढाला जो मध्यकालीन भारत के इतिहास में क्षेत्रीय सभयता  History of Regional Culture during Medieval India का एक विशेष अध्याय बन गया। तो यह था मध्यकालीन भारत के दौरान क्षेत्रीय संस्कृति का पूरा इतिहास।

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