मध्यकालीन भारत का इतिहास की पूरी जानकारी आज के पोस्ट में आप जानेंगे  भारत का जो इतिहास है वो तीन हिस्सों में बंटा हुआ है। पहला हिस्सा है प्राचीन इतिहास का जो ‘हरप्पा सभ्यता, आर्यन और मौर्य युग’ आदि के इतिहास में बंटा हुआ है। दूसरा हिस्सा है Medieval History) मध्यकालीन इतिहास का जो इस्लाम धर्म के आवागमन से लेकर मुग़ल काल तक जाना जाता है।

तीसरा हिस्सा है “History of Modern India” आधुनिक भारत के इतिहास का जो मुग़ल काल के अंत के बाद से शुरू होता है जिसमें अंग्रेजों के खिलाफ बगावत भी शामिल है, Medieval Indian History मध्यकालीन भारतीय इतिहास तीन शताब्दियों तक चलता रहा इसमें चालुक्य, प्लव, पांड्या, राष्ट्रकूट, मुस्लिम शासक और अंत में मुगल साम्राज्य सम्मिलित है, अगर हम बात करें नौंवी शताब्दी की तो उसमें सबसे उभर कर आने वाला जो वंश था वो था चोल वंश

मध्यकालीन भारत का इतिहास की पूरी जानकारी - History of medieval India

मध्यकालीन भारत का इतिहास की पूरी जानकारी – History of medieval India

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पाल वंश

8वीं और 10वीं शताब्दियों के बीच अनेक शक्तिशाली शासकों ने शासन सत्ता पर राज किया। गोपाल के पुत्र राजा धर्मपाल ने 8वीं शताब्दी से लेकर के 10वीं शताब्दी तक शासन किया। उन्होंने विक्रमशिला विश्वविद्यालय और नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की थी।

  • सेन वंश

जैसे ही पाल वंश समाप्त हुआ उसके बाद सेन वंश का शासन आरम्भ हुआ। सेन वंश के जो स्थापक थे वो थे सामंत सेन। इन्होंने बंगाल में शासन स्थापित किया। सेन वंश के सबसे शक्तिशाली और महान शासक विजय सेन हुए। विजय सेन ने ही पूरे बंगाल पर कब्ज़ा जमाया था और उन के पश्चात उनके पुत्र बल्लाल सेन ने शासन किया। सेन वंश के अंतिम शासक हुए लक्ष्मण सेन। इन्हीं के शासनकाल में मुस्लिमों ने बंगाल पर शासन किया और फिर सेन वंश के शासन का अंत हो गया।

  • प्रतिहार वंश

प्रतिहार वंश के शासक ने 836 में कन्नौज की खोज की थी और उनका नाम था मिहिर भोज और वो प्रतिहार वंश के महानतम शासक साबित हुए। उन्होंने ही वर्तमान के भोपाल शहर का निर्माण कराया था। 915-918 के बीच कन्नौज पर राष्ट्रकूट राजा ने आक्रमण किया। राष्ट्रकूट राजा ने ही प्रतिहार वंश को एकदम कमज़ोर बना दिया था और कन्नौज शहर को एकदम वीरान बना दिया था।

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  • राष्ट्रकूट राजवंश

राष्ट्रकूट ने अन्य राज्यवंशों की तुलना में एक बड़े हिस्से में राज्य किया था। राष्ट्रकूट ने कर्नाटक पर राज्य किया था। राष्ट्रकूट राजाओं ने शिक्षा और साहित्य को प्रोत्साहन दिया।

  • चोल वंश

इस राजवंश का प्रथम शासक राजाराजा चोल 1 था। इनका पुत्र था उत्तरवर्ती राजेन्द्र चोल। राजेन्‍द्र I, राजाधिराज और राजेन्‍द्र II के उत्तरवर्ती निडर शासक थे जो चालुक्‍य राजाओं से आगे चलकर वीरतापूर्वक लड़े किन्‍तु चोल राजवंश के पतन को रोक नहीं पाए। चोल वंश 14वीं शताब्दी की शुरुआत में मलिक कफूर के आक्रमण के बाद समाप्त हो गया।

  • मुहम्मद बिन कासिम

दोस्तों, मध्यकालीन भारत इतिहास जो है वो इतिहास के मामले में अपनी एक अलग छवि रखता है। इसकी सही मायने में अगर बात करें तो शुरुआत होती है भारत पर अरबों के आक्रमण से। 632ई. में पैगम्बर मुहम्मद की मृत्यु के बाद अनेकों खलीफाओं ने शासन किया और तभी से दक्षिण एशिया में इस्लाम धर्म का प्रवेश आरंभ हुआ।

मध्यकालीन भारत का इतिहास

सबसे पहले 711 में 17 वर्षीय एक बालक जिसका नाम था ‘मुहम्मद बिन कासिम’ ने खलीफा उबैदुल्ला के नेतृत्व में सिंध पर आक्रमण किया और उसकी विजय हुई। उससे पहले भी सिंध पर अरबों के द्वारा आक्रमण किये जा चुके थे। मगर 711 में अरबों की भारत पर वो पहली विजय थी।

6000 सीरियन घुड़सवार, 6000 ऊंट और 3000 सामान ढोने वाले ऊंटो को साथ लेकर अरबों ने मकरान के मार्ग से सिंध पर आक्रमण किया था। सिंध पर आक्रमण करने के बाद मुहम्मद कासिम मुल्तान की ओर बढ़ा और वहां भी विजयी होकर लौटा। मुहम्मद बिन कासिम ने मुल्तान का नाम ‘सोने का नगर’ रख दिया था। मुहम्मद बिन कासिम को रोकने के लिए दाहिर ने काफी कोशिशें की मगर वो असफल रहा और दाहिर को अपनी जान गवानी पड़ी।

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दुर्भाग्यवश मुहम्मद बिन कासिम ज्यादा समय तक जिंदा नहीं रह सका। उसकी मौत का कारण बनी दाहिर की बेटियां। दाहिर की बेटियों ने खलीफा के सामने मुहम्मद बिन कासिम के खिलाफ उनके सतीत्व को भंग करने का आरोप लगाया। अरबों के आक्रमण से पूरा उत्तरी भारत दहल गया था।

बाद में खलीफाओं की दुर्बलता एवं विलासिता की वजह से इस्लाम के नेतृत्व को अरबों को अपने हाथों से खोना पड़ा। अरबो के बाद ईरानियों ने इस्लाम की बागडोर संभाली और उनके पश्चात इस्लाम का नेतृत्व तुर्कों के हाथ में चला गया।
ईरान के शासकों की एक शाखा थी जिसका नाम था ‘यमीनी वंश’ मगर यमीनी वंश को सभी लोग ‘गजनवी वंश’ के नाम से जानते हैं। अरब आक्रमण के समय में इस वंश के शासक जो थे वो तुर्किस्तान भाग गए जिसकी वजह से उनके जो वंशज हुए वो ‘तुर्क’ कहलाए।

मध्यकालीन भारत इतिहास

  • महमूद गजनवी

‘अलप्तगीन’ ने तुर्क वंश का एक स्वतंत्र राज्य स्थापित किया था मगर 963 में ‘अमीर अबू वक्र लबिक’ ने अलप्तगीन से जबुलिस्तान और उसकी राजधानी गजनी को उससे छीन लिया। अलप्तगीन की मृत्यु 963ई. में ही हो गई थी। उसकी मृत्यु के बाद उसके सेनापति ‘बलक्तगीन’ ने गद्दी संभाली। 972 ई. में उसकी भी मृत्यु हो गयी।

उसके बाद अलप्तगीन के एक ग़ुलाम ने जिसका नाम ‘पीराई’ था उसने गद्दी संभाली। 977ई. में पीराई को हटाकर ‘सबुक्तगीन’ ने गद्दी पर अपना अधिकार जमा दिया। सबुक्तगीन भी अलप्तगीन का ग़ुलाम रहा था। 997ई. में सबुक्तगीन की मृत्यु हो गयी और मरने से पहले उसने अपना कार्यभार अपने छोटे बेटे ‘इस्माइल’ के नाम कर दिया था।

सबुक्तगीन की मृत्यु के 7 महीने बाद ही उसके बड़े बेटे ‘महमूद’ ने इस्माइल को हराकर गद्दी अपने नाम कर ली थी। 998ई. में 27 वर्ष की उम्र ने महमूद ने अपने पिता की गद्दी को अपने नाम किया, यही वह ‘महमूद गजनवी’ था जिसने भारत पर लगातार आक्रमण किये थे।

मध्यकालीन भारत का इतिहास

महमूद गजनवी का जन्म 971ई. में हुआ था। उसने 11वीं सदी से भारत पर आक्रमण करना आरंभ किया था। उसने भारत पर कम से कम 12 आक्रमण किये थे। महमूद ने 1000ई. में पहली बार आक्रमण किया और सबसे पहले उसने भारत की सीमा के कुछ किलों को अपने कब्जे में किया। फिर दूसरा आक्रमण उसने 1001ई. में किया।

दूसरे आक्रमण में राजा जयपाल ने उसका विरोध किया मगर वो युद्ध में हार गया और महमूद की विजय हुई। महमूद गजनवी ने भारत में जगह जगह पर लूटमारी की और पंजाब में अपना एक आधार स्थापित किया। महमूद ने न केवल भारत की सदियों से संचित सम्पत्ति को ही लूटने में सफलता प्राप्त की बल्कि पंजाब, मुल्तान और अफ़ग़ानिस्तान के प्रदेशों में गजनवी वंश को स्थापित किया और 1030ई. में महमूद की मृत्यु हो गई।

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मुहम्मद गोरी

महमूद गजनवी ने भारत की उत्तर पश्चिम सीमा पर तुर्क राज्य को स्थापित किया परन्तु उसने भारत में तुर्क राज्य की स्थापना नहीं की। इस कार्य की पूर्ति की गोर वंश के शासक ‘मुहम्मद गोरी’ ने। यह तुर्कों का शन्सबनी वंश था। 1027ई. में गजनवी ने अपना आखिरी आक्रमण भारत पर किया था और गोरी ने अपना प्रथम आक्रमण 1175ई. में किया था।

उत्तरी भारत के बहादुर राजपूत राजाओं ने पृथ्‍वी राज चौहान के नेतृत्‍व में 1191ई. में तराइन के प्रथम युद्ध में पराजित किया। एक साल चले युद्ध के पश्‍चात मोहम्‍मद गोरी अपनी पराजय का बदला लेने दोबारा आया। वर्ष 1192ई. के दौरान तराइन में एक अत्‍यंत भयानक युद्ध लड़ा गया.

जिसमें राजपूत पराजित हुए और पृथ्‍वी राज चौहान को पकड़ कर मौत के घाट उतार दिया गया। मुहम्मद गोरी बार-बार भारत आता और विजयी होकर वापस लौट जाता। मुहम्मद गोरी की मृत्यु 15 मार्च, 1206ई. में शाम की नमाज़ पढ़ते वक्त हुए। जब गोरी दमयक नामक स्थान पर नमाज़ पढ़ रहा था तो कुछ व्यक्तियों ने उस पर आक्रमण कर दिया।

मध्यकालीन इतिहास भारत का

दिल्ली सल्तनत

भारतीय इतिहास की अगर बात करें तो 1206ई. से लेकर के 1526ई. तक की जो समय अवधि थी वो दिल्ली का सल्तनत कार्यकाल के नाम से जानी जाती है। ये करीब 300 वर्षों का समय था और इसमें अनेकों राजवंशों ने शासन किया। जिसमें मुख्य हैं, ‘गुलाम राजवंश’, ‘खलजी राजवंश’, ‘तुगलक राजवंश’, ‘सैय्यद राजवंश’ और ‘लोदी राजवंश’।

गुलाम राजवंश

ग़ुलाम राजवंश 1206ई. से लेकर के 1290ई. तक माना जाता है। ग़ुलाम वंश के सुल्तान थे ‘कुतुबुद्दीन ऐबक’ जिन्होंने ‘कुतुबी’ राजवंश की स्थापना की, ‘इल्तुतमिश’ जिन्होंने ‘शम्सी’ राजवंश की स्थापना की और बलबन जिन्होंने ‘बलबनी’ राजवंश की स्थापना की।

◆ कुतुबुद्दीन ऐबक, इल्तुतमिश और बलबन

कुतुबुद्दीन ऐबक ( 1206ई.-1290ई. ) दिल्ली का पहला तुर्क शासक था और कुतुबुद्दीन ऐबक को ही भारत में तुर्की राज्य का संस्थापक भी माना जाता है। कुतुबुद्दीन ऐबक ने इल्तुतमिश ( 1211ई.-1236ई. ) को 1197ई. में अन्हिलवाड़ा के युद्ध के बाद खरीदा और वही इल्तुतमिश बाद में ऐबक का दामाद और दिल्ली का सुल्तान बना।

सुल्तान इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद कई लोगों ने दिल्ली का कार्यभार संभाला। जिसमें सबसे पहले हुए रुकनुद्दीन फिरोजशाह ( 1236ई. )। इनके बाद सुल्ताना रजिया ( 1236ई.-1240ई. ) दिल्ली की सुल्ताना बनी। फिर मुइज्जुद्दीन बहरामशाह ( 1240ई.-1242ई. ) सुल्तान बना। उसके बाद अलाउद्दीन मसूदशाह ( 1242ई.-1246ई. ) और फिर अंत मे नासिरुद्दीन महमूद ( 1246ई.-1265ई. ) दिल्ली का सुल्तान बना। ये सभी सुल्तान इल्तुतमिश के उत्तराधिकारी थे।

जिस प्रकार से कुतुबुद्दीन ऐबक ने इल्तुतमिश को खरीदा था उसी प्रकार से इल्तुतमिश ने 1232 ई. में बहाउद्दीन बलबन ( 1265ई.-1287ई. )को 1232ई. में खरीदा और फिर बलबन ने इल्तुतमिश की एक पुत्री से विवाह कर लिया और इल्तुतमिश का दामाद बन गया और अंत में बलबन दिल्ली का सुल्तान बन गया।

बलबन ने अपनी मृत्यु से पहले अपने बड़े बेटे को पुत्र कैखुसरव को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था मगर किसी कारणवश उसको सुल्तान के पद से हटाकर बलबन के दूसरे पुत्र के पुत्र कैकुबाद को दिल्ली की सल्तनत दे दी गयी।

मध्‍यकालीन इतिहास

खलजी राजवंश

बलबन की मौत के पश्चात जलालुद्दीन खलजी को दिल्ली का नवीन सुल्तान घोषित किया गया। अलाउद्दीन खिलजी ( 1296ई.-1316ई ) जो जलालुद्दीन खिलजी का भतीजा था उसने षड़यंत्र किया और सुल्‍तान जलालुद्दीन को मार कर 1296ई. में स्‍वयं सुल्‍तान बन बैठा। अलाउद्दीन खिलजी प्रथम मुस्लिम शासक था जिसके राज्‍य ने पूरे भारत का लगभग सारा हिस्‍सा दक्षिण के सिरे तक शामिल था।

उसने कई लड़ाइयां लड़ी, गुजरात, रणथम्‍भौर, चित्तौड़, मलवा और दक्षिण पर विजय पाई। उसके 20 वर्ष के शासन काल में कई बार मंगोलों ने देश पर आक्रमण किया किन्‍तु उन्‍हें सफलतापूर्वक पीछे खदेड़ दिया गया। इन आक्रमणों से अलाउद्दीन खिलजी ने स्‍वयं को तैयार रखने का सबक लिया और अपनी सशस्‍त्र सेनाओं को संपुष्‍ट तथा संगठित किया। वर्ष 1316ई. में अलाउद्दीन की मौत हो गई और उसकी मौत के साथ खिलजी राजवंश समाप्‍त हो गया।

तुग़लक राजवंश

तुग़लक राजवंश का पहला सुल्तान था गियासुद्दीन तुगलक ( 1320ई.-1325ई. )। ये अलाउद्दीन खिलजी के समय मे पंजाब का राज्यपाल था। गियासुद्दीन तुगलक न बंगाल पर बगावत की। बलबन की मृत्यु के बाद से बंगाल स्वतंत्र हो चुका था। इसीलिए गियासुद्दीन तुगलक ने उस पर शासन किया। उसकी मृत्यु दुर्घटना के कारण हुई।

गियासुद्दीन तुगलक की मृत्यु के तीन दिन बाद ही उसका पुत्र उलूगखां ‘मुहम्मद बिन तुगलक’ ( 1325ई. – 1351ई. )के नाम से नवीन सुल्तान बना। मुहम्मद बिन तुगलक का विश्वास था कि सुल्तान बनना ईश्वर की इच्छा है। इसीलिए उसने अपने सिक्कों पर ‘अल सुल्तान जिल्ली अल्लाह’ (सुल्तान ईश्वर की छाया है), आदि वाक्यों को अंकित कराया।

मुहम्मद तुग़लक़ दिल्ली सुल्तानों में पहला ऐसा सुल्तान था जिसने उत्तरी और दक्षिणी भारत की प्रशासनिक और सांस्कृतिक एकता का प्रयत्न किया। उसके समय में चांदी की बेहद कमी हो गई थी इसीलिए उसने पीतल एवं ताँवे के सिक्के चलाए। मुहम्मद बिन तुगलक के समय में मंगोलों का बस एक आक्रमण हुआ था। मुहम्मद बिन तुगलक के समय में ही नगरकोट को जीता गया, कराजल पर आक्रमण किया गया।

मुहम्मद बिन तुगलक के बाद ‘फिरोज’ सुल्तान बना। फिरोज ( 1351ई.-1388ई. ) गियासुद्दीन तुगलक के छोटे भाई रज्जब का पुत्र था। फिरोजशाह के बाद उसके उत्तराधिकारी दिल्ली के सुल्तान बने और 1398 में तैमूर के आक्रमण के बाद ही हम कह सकते हैं कि तुगलक राजवंश का पतन हो गया।

सैय्यद राजवंश

सैय्यद राजवंश का शासनकाल 37 वर्षों तक का रहा। सैय्यद वंश का संस्थापक खिज्रखां को माना जाता है। उसने 1414ई. से 1421ई. तक शासन किया। उसके बाद मुबारकशाह ने 1421ई. से 1434ई. तक शासन किया। मुबारकशाह के बाद मुहम्मदशाह ( 1434ई.-1445ई. ) ने और अंत में अलाउद्दीन आलमशाह ने 1445ई. से 1450ई. तक शासन किया।

लोदी राजवंश

दिल्ली की सल्तनत में सिंहासन पर राज्य करने वाले राजवंशों में लोदी आखिरी वंश था। लोदी वंश की स्थापना बहलोल लोदी ने की थी। लोदी वंश ने 75 वर्षों तक शासन किया। लोदी शासकों का प्रथम संघर्ष जौनपुर, गुजरात, मालवा और मेवाड़ के शक्तिशाली राज्यों से अपनी अस्तित्व की सुरक्षा और शक्ति के विस्तार के लिए हुआ।

उनका दूसरा संघर्ष जमीदारों और अमीरों से था जो दुर्बल सुल्तानों के समय में प्रायः स्वतंत्र हो गए थे। लोदी सुल्तानों का तीसरा संघर्ष हुआ अफगान के सरदारों से, बहलोल लोदी ने दिल्ली में 1451ई. से 1489ई. तक शासन किया। उसके बाद सिकन्दरशाह लोदी ने 1489ई. से 1517ई. तक शासन किया। सिकन्दरशाह लोदी के बाद इब्राहिम लोदी ने 1517ई. से 526ई. तक शासन किया।

विजयनगर साम्राज्य

विजयनगर साम्राज्य का संस्थापक हरिहर था। जिसने 1336ई. से 1356ई. तक शासन किया। जसने सात वर्ष के बाद विजयनगर को राजधानी बनाया। इसने होयसल राज्य को जीतकर विजयनगर से मिलाया, मदुरा के मुसलमानी राज्य को पराजित किया। इसके बाद बुक्का प्रथम ने 1356ई. से 1377ई. तक शासन किया। इसने तेलुगु साहित्य को प्रोत्साहन दिया। उसके बाद देवराय प्रथम ने 1404ई. से 1422ई. तक शासन किया उसने तुर्की तीरंदाजों को सेना में शामिल किया और उसके बाद देवराय द्वितीय ने 1422ई. से 1496ई. तक शासन किया।

धार्मिक दशा

सूफी सम्प्रदाय

सूफी व्यक्ति को ब्रह्मज्ञानी तथा अध्यात्मवादी माना जाता है। इसको मुस्लिम रहस्यवादी आंदोलन भी पुकारा गया है। शुरुआत में अरब में जो व्यक्ति ‘सफ़’ या फिर भेड़ के बालों के ऊनी वस्त्र को धारण करते थे उन्हें सूफी कहा गया। ‘सफा’ का अर्थ है पवित्रता। इसीलिए पवित्र विचारों वाले जो व्यक्ति हुए वो सूफी कहलाए। सूफी संत संगीत और गायन को ईश्वर का नाम लेने में सहायक मानते थे। उनका विश्वास गुरु में था जिसे वो लोग ‘पीर’ पुकारते थे।

भक्ति आंदोलन

मध्य युग के धार्मिक जीवन की भक्ति आंदोलन के एक महान विशेषता रही। हिंदू धर्म में मोक्ष को प्राप्त करने के तीन मार्ग बताए गए हैं, ज्ञान, कर्म तथा भक्ति। भक्ति युग में धर्म प्रचारकों ने भक्ति मार्ग पर बल दिया और जिसका परिणाम भक्ति आंदोलन का जन्म हुआ।

भक्ति आंदोलन में विभिन्न सन्त हुए। एक थे ‘रामानुज’। जिनका जन्म आंध्र प्रदेश के त्रिपुती नामक स्थान पर हुआ। इनके अनुसार कर्म मार्ग व्यक्ति को ‘माया’ में बांधता है। एक और सन्त थे जिनका नाम था ‘निम्बार्क’। निम्बार्क राधाकृष्ण के उपासक थे।

इनके बाद 13वीं सदी में ‘माधवाचार्य’ हुए। ये परमात्मा को पृथक-पृथक मानते थे। ये लक्ष्मीनारायण के उपासक थे। 14वीं सदी में एक संत हुए जिनका नाम था ‘रामानन्द’। उनका जन्म इलाहाबाद में हुआ था। वास्तव में मध्य युग का जो भक्ति आंदोलन था वो रामानन्द से शुरू हुआ था।

रामानन्द के एक प्रमुख शिष्य थे ‘कबीरदास’ जी। वे सिकन्दर लोदी के समय के थे। लोदी ने कबीरदास को मारने के काफी प्रयास किये थे परंतु वो असफल साबित हुए। कबीरदास की एक पत्नी, एक पुत्र तथा पुत्री थी। कबीरदास जी ने भक्ति को ही मोक्ष प्राप्ति का मार्ग बताया है।

कबीर की तरह ही एक अन्य सन्त हुए जिनका नाम है सन्त ‘नानक’। नानक का जन्म खत्री परिवार में हुआ। नानक का विश्वास ईश्वर की एकता में था। सन्त ‘वल्लभाचार्य’ एक ऐसे सन्त थे जो कृष्ण की भक्ति में विश्वास करते थे। वल्लभाचार्य के पुत्र ‘विट्ठलनाथ’ ने कृष्ण भक्ति को और भी अधिक लोकप्रिय बनाया।

भक्ति मार्ग के एक अन्य महान संत हुए ‘चैतन्य’। 15वीं सदी में में महाराष्ट्र में नामदेव ने भक्ति मार्ग को बहुत लोकप्रिय बनाया। भक्ति मार्ग की विचारधारा मुगल काल मे भी लोकप्रिय रही। मुग़ल काल के महान संत हुए जनेश्वर, तुकाराम, जनतीर्थ, रविदास, मलूकदास, चण्डीदास, मीराबाई, सूरदास, तुलसीदास आदि।

मुगल काल

◆ बाबर

मुगल काल शुरू होता है 1526ई. से। मुगल वंश की स्थापना भारत में ‘बाबर’ ने की। बाबर ( 1526ई.-1530ई. ) ने पानीपत के प्रथम युद्व में उजबेकों की युद्व नीति ‘तुलगमा युद्ध पद्धति’ तथा तोपों को सजाने में ‘उस्मानी विधि’ का प्रयोग किया।

‘मिर्जा’ की पैतृक उपाधि का त्याग कर 1507ई. में काबुल विजय के उपलक्ष्य में ‘पादशाह’ की उपाधि धारण की, खानुवा और चंदेरी युद्ध में ‘जिहाद’ घोषित किया। पानीपत की विजय के उपलक्ष्य में काबुल के प्रत्येक निवासी को एक चाँदी का सिक्का दान में देने के कारण बाबर को ‘कलन्दर’ नाम से भी जाना जाता है।

21 अप्रैल 1526ई. में बाबर के शासन काल में पानीपत का प्रथम युद्ध हुआ। इससे लोदी वंश समाप्त हो गया और बाबर ने दिल्ली तथा आगरा पर ही नहीं बल्कि लोदी साम्राज्य के सभी राज्यों को अपने अधीन कर लिया। 17 मार्च, 1527ई. में खानुवा का युद्ध हुआ।है युद्ध बाबर और राणा सांगा के बीच हुआ। ये युद्ध 20 घण्टे तक चला।

अंत में युद्ध में बाबर विजयी हुआ। खानुवा कि युद्ध के बाद बाबर की दूसरी मुख्य विजय थी चंदेरी की विजय जोकि 1528ई. में बाबर को मिली थी।6 मई 1529ई. में बाबर का अफगानों के साथ घाघरा युद्ध हुआ। इस युद्ध मे भी बाबर को सफलता प्राप्त हुई।

घाघरा का युद्ध बाबर का अंतिम युद्ध था। 26 दिसम्बर, 1530ई. में बाबर की मृत्यु हो गयी और मरने से पहले बाबर ने अपना उत्तराधिकारी हुमायूँ को नियुक्त कर दिया था। बाबर के शव को पहले आगरा के आरामबाग में और बाद में काबुल में दफना दिया गया।

◆ हुमायूँ

हुमायूँ बाबर का सबसे बड़ा बेटा हुमायूँ था। उसका जन्म 6 मार्च 1508ई. को काबुल में हुआ था। उसकी मां का नाम माहम सुल्ताना था। हुमायूँ का शासनकाल बाबर की मृत्यु के पश्चात शुरू हुआ। हुमायूँ ने 1530ई. से लेकर 1556ई. तक साम्राज्य स्थापित किया।

26 जून, 1539ई. में चौसा का युद्ध हुआ। इसमें हुमायूँ को शेरखां का सामना करना पड़ा और हुमायूँ को हार से संतोष करना पड़ा। 17 मई, 1540ई. में कन्नौज का युद्व हुआ। इसमे भी मुगलों को हार का सामना करना पड़ा। अंत में हारकर हुमायूँ सिंध चला गया।

◆ शेरशाह सूरी

शेरशाह सूरी ने 1540ई. से 1555ई. तक गद्दी पर राज किया। शेरशाह के बचपन का नाम फरीद था। 1540ई. में शेरशाह सूरी न उत्तर भारत में सूरवंश तथा द्वितीय अफगान साम्राज्य की स्थापना की। आगरा से बुरहानपुर तक, आगरा से जोधपुर होती हुई चित्तौड़ तक, लाहौर से मुल्तान तक, बंगाल में सोनारगांव से शुरू होकर दिल्ली तक सड़कों का निर्माण कराया।

शेरशाह सूरी के बाद उसके उत्तराधिकारी ने गद्दी सम्भाली। जिसमे इस्लामशाह ने 1545 से 1553ई. तक और फिरोजशाह ने राज्य का कार्यभार संभाला। मध्यकालीन भारत का इतिहास

अकबर

समस्त मध्य युग के भारतीय शासकों में अकबर को श्रेष्ठ स्थान दिया गया है। इतिहास में अकबर को एक अलग ही स्थान दिया गया है। अकबर का जन्म 15 अक्टूबर, 1542ई. में हुआ था। अकबर की माता का नाम हमीदा बानू बेगम था। अकबर जब 13 वर्ष का था तभी उसके पिता हुमायूँ की मृत्यु हो गई। अकबर ने अपने संरक्षक बैरमख़ाँ को ‘खान ए खाना’ की उपाधि दी थी।

5 नवम्बर, 1556ई. में पानीपत का द्वितीय युद्ध हुआ। इस युद्ध में अकबर का सामना हुआ हेमू से जिसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण कर ली थी। इस युद्ध में हेमू की पराजय हुई और उसकी मृत्यु हो गयी। 18 जून, 1576ई. में हल्दीघाटी का युद्व हुआ। इस युद्ध में भी अकबर महान की जीत हुई।

हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप को हार का सामना करना पड़ा। 1559ई. में महाराणा प्रताप की मृत्यु हो गयी और उनकी मृत्यु के बाद उनका पुत्र अमरसिंह उत्तराधिकारी बना। 3 अक्टूबर, 1605ई. को अकबर बीमार हो गया। उसकी बीमारी का पता ठीक प्रकार से नहीं चल पाया है मगर उसकी मृत्यु 25 अक्टूबर को 1605ई. में हो गई। अकबर को आगरा के मकबरे में दफनाया गया।

◆ जहाँगीर

अकबर की मृत्यु के बाद उनका इकलौता ज़िंदा बेटा जहाँगीर था। अकबर की मृत्यु के पहले ही उसके सारे पुत्रों की मृत्यु हो चुकी थी। इसीलिए अकबर के बाद जहाँगीर को शासन करने का मौका मिला। जहाँगीर का जन्म 30 अगस्त, 1569ई. में हुआ था।

जहाँगीर की माता का नाम राजकुमारी मरियम उज्जमानी था। उसने मेहर उन निसा से निकाह किया, जिसे उसने नूरजहां (दुनिया की रोशनी) का खिताब दिया। नूरजहां का बचपन का नाम मेहरुन्निसा था। वह उसे बेताहाशा प्रेम करता था और उसने प्रशासन की पूरी बागडोर नूरजहां को सौंप दी।

उसने कांगड़ा और किश्‍वर के अतिरिक्‍त अपने राज्‍य का विस्‍तार किया तथा मुगल साम्राज्‍य में बंगाल को भी शामिल कर दिया। जहांगीर के अंदर अपने पिता अकबर जैसी राजनैतिक उद्यमशीलता की कमी थी, किन्‍तु वह एक ईमानदार और सहनशील शासक था।

1620ई. से जहाँगीर का स्वास्थ्य एकदम खराब होता जा रहा था। लाख कोशिशों के बाद भी जहाँगीर के स्वास्थ्य में कोई भी प्रभाव नहीं दिख रहा था। 1627ई. में जहाँगीर कश्मीर चला गया मगर वहां भी उसका स्वास्थ्य नहीं सुधर सका। जिसकी वजह से वो वापस लाहौर जाने लगा और बीच रास्ते में ही 7 नवम्बर, 1627ई. में जहाँगीर की मृत्यु हो गई।

◆ शाहजहां

शाहजहां के शासन काल को मुगल काल का ‘स्वर्ण काल’ कहा जाता है। शाहजहां का जन्म 5 जनवरी, 1592ई. में हुआ। शाहजहां का बचपन में नाम शाहजादा खुर्रम था। उसका विवाह अर्जुमंदबानू बेगम से हुआ जिसका बाद में नाम मुमताज महल हुआ।

शाहजहां ने भारत के भिन्न भिन्न राज्यों में विद्रोह किया और सफलता पाई। शाहजहां को वास्तुकार का राजा भी कहा जाता है। शाहजहां ने अपने जीवन के अंतिम आठ साल आगरा के किले में शाह बुर्ज में व्यतीत किए। उसका एकमात्र सहारा उसकी पुत्री जहानआरा थी जिसने मृत्यु तक उसकी सेवा की।

1666ई. में अपनी प्रिय पत्नी मुमताजमहल को याद करते हुए और ताजमहल को निहारते हुए 74 वर्ष की आयु में शाहजहां की मृत्यु हो गई। मृत्यु की बाद शाहजहां के शव को उसकी पत्नी के शव के निकट ही दफन कर दिया गया।

◆ औरंगजेब

औरंगजेब मुमताज महल की कोख से जन्म शाहजहां का पुत्र था। औरंगजेब ने अपने पिता की मृत्यु के बाद 1658 में गद्दी को संभाला। उसने अकबर के बराबर ही लम्बे समय तक शासन किया। 1658 से लेकर 1707 तक औरंगजेब के शासन रहा।

अपने 50 वर्ष के शासन काल में औरंगजेब ने इस पूरे उप महाद्वीप को एक साथ एक शासन लाने की आकांक्षा को पूरा करने का प्रयास किया। यह उसी के कार्यकाल में हुआ जब मुगल शासन अपने क्षेत्र में सर्वोच्‍च बिन्‍दु तक पहुंचा। उसने वर्षों तक कठिन परिश्रम किया किन्‍तु अंत में उसका स्‍वास्‍थ्‍य बिगड़ता चला गया। मध्यकालीन भारत का इतिहास

औरंगजेब की मृत्यु स्वास्थ्य बिगड़ने की वजह से 90 वर्ष की आयु में 1707ई. में हुई और तभी हुआ पतन एक शक्तिशाली मुगल साम्राज्य का।

यहीं खत्म हो जाता है मुगलों का इतिहास। वस्तुतः अंग्रेजों ने भारत का साम्राज्य मुगलों से नहीं बल्कि मराठों से प्राप्त किया। 18वीं शताब्दी में मराठे भारत की श्रेष्ठ शक्ति बन गए थे। मराठा शक्ति 1627ई. से 1707ई. तक भारत में रही।

छत्रपति शिवाजी

20 अप्रैल, 1627ई. को पूना के उत्तर में स्थित जुन्नान नगर के निकट शिवनेर के दुर्ग में शिवाजी का जन्म हुआ था। शिवाजी के पिता का नाम शाहजी भौंसले और माता का नाम जीजाबाई था। शुरुआत से शिवाजी चाहते थे कि वो एक स्वतंत्र राज्य स्थापित करें।

हिंदू धर्म की रक्षा की भावना उनमे थी परंतु उनका मुख्य उद्देश्य राजनीति था। 1657ई. में पहली बार शिवाजी का मुकाबला मुगलों के साथ हुआ था। शिवाजी को मारने के लिए बहुत संघर्ष किये गए मगर सभी संघर्ष असफल रहे। शिवाजी ने एक स्वतंत्र हिन्दू राज्य की स्थापना करने सफलता पाई। मध्यकालीन भारत का इतिहास

शिवाजी के पश्चात उनका सबसे बड़ा पुत्र शम्भाजी उत्तराधिकारी हुआ। शिवाजी की मृत्यु के समय वो पन्हाला के किले में कैद था। शम्भाजी ने 1680ई. से 1689ई. तक शासन किया। इसके बाद अनेक मराठा शासकों ने स्वतंत्रता संग्राम किया।

मुगल साम्राज्य का पतन

औरंगजेब ने अपनी मृत्यु से पहले अपने जीवित पुत्रों में साम्राज्य को विभाजित करने की वसीयत की थी। मगर उसकी मृत्यु के बाद उसके पुत्रो में सिंहासन के लिए विद्रोह हुआ। उसका पुत्र शाहआलम जिसने बहादुरशाह की उपाधि धारण कर ली उसने सिंहासन अपने नाम कर लिया।

बहादुरशाह ने 1707ई. से 1712ई. तक शासन किया और उसकी मृत्यु के बाद उसके पुत्रों में भी सिंहासन के लिए युद्ध हुए और फिर उसका पुत्र जहाँदारशाह सिंहासन को प्राप्त कर सका और तभी से मुगल साम्राज्य का अंत हो गया तो आपको यह आर्टिकल मध्यकालीन भारत का इतिहास कैसा लगा जरुर बताये

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