मध्यकालीन भारत का भक्ति काल सूफी काल और पंजाबी काल का इतिहास: History of medieval India भक्ति आन्दोलन के दौरान अनेक अनुसरण शैलियों का आगमन देखा गया यह वो दौर था जब लोगों के बीच अनेक विचारधारों का संगम उपस्थित था एक ओर कुछ लोग ब्राम्हणों द्वारा मार्गदर्शित की गई वर्ण व्यवस्था का अनुसरण कर रहे थे.

तो वहीं दूसरी ओर अनेक लोग इस व्यवस्था के विपक्ष में भी थे। कई जन ऐसे भी तो जो इस व्यवस्था से बिल्कुल भी सहमत नहीं थे, जिसके परिणाम स्वरूप उन्होंने बुद्ध और जैन धर्म की शरण मे जाना बेहतर समझा, उनके मार्गरदर्शन के अनुसार सभी सामाजिक कठिनाइयों को समाप्त किया जाना व्यक्तिगत अनुभव की सहायता से  सम्भव था।

मध्यकालीन भारत का भक्ति काल सूफी काल और पंजाबी काल का इतिहास

साथ ही साथ कुछ लोग एक परमात्मा के संकलन का अनुसरण करते थे और पूर्ण श्रद्धा और भक्ति से इस धर्म का पालन करना अपना दायित्व समझते थे, इस सूत्र को भगवतगीता में भी खास महत्व दिया गया है। दैवीय शक्ति के प्रति असीम श्रद्धा और विश्वास ही सभी भक्ति और सूफी आंदोलनों का मूल मंत्र था।भक्ति आन्दोल का यह सूत्र इतना प्रचलित हुआ की इसे बुद्ध और जैन धर्म ने भी अपनाया।

मध्यकालीन भारत का भक्ति काल सूफी काल और पंजाबी काल का इतिहास

भक्ति आन्दोल Bhakti Cult-

मध्यकालीन भारत का भक्ति काल सूफी काल और पंजाबी काल  History of Bhaktisn Sufism and Sikhism का सम्पूर्ण इतिहास की पूरी जानकारी में

भक्ति आन्दोलन के अनुसार मोक्ष प्राप्त करने का रास्ता कर्म से होकर ही जाता है। इस आंदोलन की शुरूआत दक्षिण भारत (South India) से हुई ऐसा माना जाता था की जीवन में अंतर शांति का स्रोत केवल ईश्वर के आराधना और ईश्वर के प्रति किये गए सम्पूर्ण समर्पण में ही है।

इस आन्दोलन के दौरान लोग मात्र उस धर्म से संतुष्ट नहीं थे जिनका अस्तित्व केवल उत्सवों में जीवित था बल्कि यह आन्दोलन अनेक सूत्रों और विचारों का मिला जुला स्वरूप था जिसमें कई सन्तों के सिखाए गए सिद्धान्तों का पालन किया गया.

इस भक्ति आंदोलन में सभी सन्तों की मानसिकताएं अलग थी लेकिन उन सब का एक मात्र उद्देश्य था की समाज को निरर्थक धर्म के जाल से बचाया जा सकें जो सिर्फ मनुष्यों को दबाव में रखने पर उतारू था। साथ ही साथ इस आंदोलन ने जातिवादी मानसिकता का भी पुरज़ोर विरोध किया।

भक्ति आंदलोन के कुछ प्रमुख नेतृत्व कर्ता-

  • नामदेव और रामानन्द- नामदेव और रामानन्द महाराष्ट्र और अहमदाबाद से जुड़ाव रखते थे। इन दोनों ने इस आंदोलन में नेतृत्व कर चारों वर्णों के लोगो को भक्ति के सूत्र सिखाए और जातिवादी सोच का विरोध करते हुए सभी के साथ भोजन बाँटने के प्रथा का आरम्भ किया।
  • सन्कारा और रामानुजन Sankara and Rananajuna- इन दोनों ने ईश्वर के निर्गुण और सगुण स्वरूप का उल्लेख किया।
  • वलब्भचार्य Vallabhacharya- इन्होंने शुद्ध अद्वित्या की शुरुआत की।
  • चैतन्य Chaitanya- इन्होंने ईश्वर की आराधना संगीतमय रूप में प्रारम्भ की। प्रेम इनकी आराधना का मूलाधार था।
  • कबीर Kabir- सन्त कबीर रामानन्द के शिष्य थे जिनका पालन पोषण एक मुस्लिम दर्जी के द्वारा किया गया। कबीर ने सभी धर्मों में मौजूद अंधविश्वास के विपक्ष में रहकर आंदोलन का समर्थन किया।

नाथपंथी सिद्ध जन औऱ योगी Naath patni Siddhas and Yogis-

नाथपंथी सिद्ध जन औऱ योगियों ने धर्मों में उपस्थित अंधविश्वास और रूढ़िवादी मानसिकता का विरोध अत्यंत सरल तथ्यों को सामने रखते हुए किया। इन्होंने समस्त विश्व को एक सूत्र में बांधने की बात सबके सामने रखी। इनके अनुसार मोक्ष प्राप्त करने का रास्ता समस्त संसार की एकरूपता में शामिल था।

इस मानसिकता को हासिल करने के लिए उन्होंने मानव मस्तिष्क को नयंत्रण में करने की अनेक शिक्षाएँ दी साथ ही साथ शारिरिक कुशलता के लिए अनेक योगासन और व्यायाम सिखाए और एकाग्रता के लिए ध्यान को प्रमुख बताया। इन समूह का प्रचलन मुख्य रूप से सीमित जातियों के बीच था।

सूफी काल Sufism

सूफी का शाब्दिक अर्थ है ऊन। अरब के कुछ लोग मध्यकालीन भारत के दौरान आपने शरीर को धूल से बचाने के लिए ऊन से बुने हुए वस्त्रों को धारण करते थे। सूफी आंदोलन का आरम्भ परसिया में हुआ। उसके बाद यह कारवाँ भारत तक बड़ा और इस आंदोलन ने अनेक शैलियों को अपनाया जिसमे संगीत और योगासन प्रमुख थे।

इस आंदोलन में दो प्रकार के सूफी शामिल हुए- बशारा (Bashara) और बेशारा (Besahara) और वहीं एक ओर शरा थे जिन्होंने इस्लाम का समर्थन किया। सूफी संतों ने स्वयं को 12 सिलसिलों में विभाजित किया (12 Orders) जिनमें चिस्ती (Chisti) और सुरावर्दी (Suhrawardi) प्रमुख थे। यह दोनों सिलसिले बशारा सूफी के भाग थे।

चिस्ती सिलसिले के शुरुआत ख्वाजा मुनिउद्दीन चिस्ती (khwaja Muni uddin Chisti) के द्वारा की गई जो 1192 में भारत आए थे यह मुख्यतः अपने लेखन कार्य के लिए प्रख्यात हुए। सूफी मुस्लिम संगीतकार थे जो कविताओं जा सर्जन कार्य भी करते थे। उन्होंने अनेक धर्मों के कई सूत्रों का पालन किया।

उन्होंने धर्म के प्रति रूढ़िवादी मानसिकता का विरोध किया और परमात्मा के प्रति समर्पण और सभी लोगो के बीच प्रेम भाव को सर्वोपरि बताया। सभी 12 सिलसिलों के सूफी संतों के अपने अलग तरिके थे। सूफी संतों ने मुस्लिम रूढ़िवादी सोच का भी खास विरोध किया।

सिख आन्दोलन Sikkhism-

बाबा गुरुनानक देव Baba Gurunanak Dev  1469-1539)

गुरुनानक देव ने रवि नदी के तट पर करतारपुर में डेरा बाबा नानक नामक केंद्र को स्थापित किया। गुरुनानक देव द्वारा जो धार्मिक स्थल की स्थापना की गई उसका नाम धर्मसाल पड़ा, जिसे गुरुद्वार के नाम से भी जाना गया। उनकी मृत्यु के पूर्व गुरु अंगद (Guru Angad) को भार सौंपा गया।

गुरु अंगद ने गुरुनानक की सभी सीखो को संलग्न कर उसमें अपने सूत्रों को भी शामिल कर गुरुमुखी की शुरुआत की। गुरु अंगद के तीन शिष्यों ने भी नानक (Nanak) नाम के साथ लेखन कार्य किया और इनकी रचनाओं को गुरु अर्जुन (Guru Arjun) की रचनाओं के साथ सन 1604 में संलग्न किया गया।

साथ ही साथ इनमे शेख फरीद, भगत नामदेव, गुरु तेज बहादुर की भी रचनाएँ प्रमुख थी। सन 1706 में इन सभी रचनाओं को आधार दिया गया गुरु गोबिंद सिंह (Guru Gobind Singh) के द्वारा किया गया जिसको गुरु ग्रन्थ साहिब (Guru Granth Sahib) का नाम दिया गया। तो इस तरह से गुरु नानक देव के मार्गदर्शन में सिख आन्दोलन को पूरा किया गया जो 17 वी शताब्दी में सफल हुआ। तो यह था पंजाबी आंदोलन का सम्पूर्ण इतिहास।

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