मध्यकालीन भारत के नगर, व्यापारियों और शिल्पकर्ताओं का पूरा इतिहास Full History of Towns, Traders and Craftspersons of Medieval India – मध्यकालीन काल मे अनेक नगर स्थापित किये गए साथ ही साथ अनेक व्यापारियों और शिल्पकर्ताओं ने मिल कर मध्यकालीन भारत के इतिहास को काफी मजबूत बनाया 7 वी शताब्दी से लेकर 16 वीं शताब्दी  तक मधयकालीन भारत मे कई बदलाव देखने को मिले फिर वो व्यवसाय के क्षेत्र में हो प्रशासनिक नगरों के क्षेत्र में हो या फिर शिल्प ओर कला के क्षेत्र में हो। तो आइए पढ़ते है – मध्यकालीन भारत के नगर, व्यापारियों और शिल्पकर्ताओं का पूरा इतिहास-मध्यकालीन भारत के नगर, व्यापारी और शिल्पकारों का पूर्ण इतिहास

मध्यकालीन भारत के नगर , व्यापारियों और शिल्पकर्ताओं का पूरा इतिहास

मध्यकालीन भारत के नगरों में सबसे मुख्य नगर था थंजावूर चोल साम्राज्य के शासन काल मे थंजावूर चोल साम्राजय के राजधानी बना। 8 वीं शताब्दी के आरंभ से भारत में कई नगरों की स्थापना हुई इन सभी नगरों में मंडी का प्रचलन प्रमुख था जहाँ सभी व्यापारी व्यवसाय करने आते थे और इन नगरों में हाट भी आयोजित होते थे।

इन नगरों में ज़मींदारों की भी अहम भूमिका होती थी क्योंकि ज़मींदार ही सभी प्रकार के व्यवसाय, ज़मीनों, कलाओं पर कर लगाते थे और उस कर को हासिल भी करते थे। भारत के मध्यकालीन इतिहास में राजनीतिक अस्थिरता थी जिसके फलस्वरूप नगर निर्माण में अनेक समस्याओं का आगमन भी हुआ, दिल्ली सल्तनत के प्रमुख नगर- फ़िरोज़ाबाद, जानपुर, तांजोर, तमिल नाडु, लखनऊ, भोजपाल, हिसार थे।

Full history of the cities, traders and craftsmen of medieval India

15 वी शताब्दी में नगरों का निर्माण कार्य काफी तेज़ी से हुआ और यह निर्माण 18 वीं शताब्दी के मध्य तक चला। मध्यकाल के नगरों की यहीं विशेषता था की उन में बाज़ार की प्रमुखता थी। उस कस्बों से लेकर जिलों की भी ख़ास महत्वता थी। मुग़ल काल के नगरों में दिल्ली, आगरा, लखनऊ आदि शहर प्रमुख थे।

मध्यकालीन इतिहास में नगर व्यवसाय और सभी प्रकार के लेन-देन के केंद्र थे। फतेहपुर सीकरी का निर्माण अकबर द्वारा करवाया गया था और शजहाँबद का निर्माण शाहजहाँ द्वारा करवाया गया था। यह दो भी उस दौर के प्रमुख नगरों में शामिल थे। भौगोलिक पहलू ने भी नगरों के विकास में खास भूमिका निभाई।

नदियों के नज़दीक नगरों का निर्माण अति शीघ्रता से हुआ और केंद्रीय क्षेत्रों की यहाँ प्रमुखता थी साथ ही साथ पशुपालन का भाग मौजूद था जिसके फलस्वरूप नगरों का निर्माण कुशलता से हुआ। मध्यकालीन भारत के नगर, व्यापारियों और शिल्पकर्ताओं का पूरे इतिहास में भी यह एक अहम कड़ी थी।

मध्यकालीन भारत के व्यापारी –

मध्यकालीन भारत मे इतिहास में व्यापारियों व्यापार के सिलसिले में कई यात्राएँ करनी पड़ती थी। जिसके कारण वह समूह मे यात्राएँ पूर्ण करते थे।। और बहुत से कार्यो को पूरा करते थे जिसके फलस्वरूप सभी यात्राएँ उनके हित में प्रमाणित होती थी। इन समूहों में दो समूह प्रमुख थे – मणिग्रामम और नानादेसी। इन दोनों समूहों ने समस्त भारत में व्यापार के कई मानक स्थापित किए। मध्यकालीन भारत के व्यापारी मूलतः चीन (China), पारसी (Persian), सीरियाई (Serian) के व्यापारी प्रमुख थे। मध्यकालीन भारत के व्यापारी-

  • अब्दुल ग़फ़ूर (Abdul Ghafoor)
  • विरजी वोहरा (Virji Bohra)
  • बरनीर (Bernier)
  • राल्फ (Ralph).

मध्यकालीन भारत के इतिहास के दौरान विश्व भर से अनेक व्यापारी आए जिन्होंने भारत के साथ अपने व्यापार को स्थापित किया। यहीं वह समय था जब भारत के सम्बंध विश्व व्यापक व्यवसाय के क्षेत्र में भी सशक्त हुए। इन व्यापारियों में प्रमुख रूप में- पॉर्टगुज (Portuguese) डच (Dutch) परसिया (Persian) के व्यापारी शामिल थे।

भारत के लघु उद्योग भी विश्व व्यापार का अंग भी इसी दौरान बना। भारत कपास, रेशम, कपड़े, ऊन, लकड़ी, रसायन, के क्षेत्र में मज़बूत पकड़ रखता था साथ ही साथ भारत लघु उद्योगों का केंद्र भी था। मध्यकालीन भारत के व्यापार में पटना, सूरत, दिल्ली, आगरा, पुलिकत आदि मुख्य केंद्र थे।

मध्यकालीन भारत के नगर, व्यापारियों और शिल्पकर्ताओं का पूरा इतिहास में आगे-

मध्यकालीन भारत के शिल्पकर्ता

मध्यकालीन भारत के शिल्प कला में भी ख़ास मुकाम था। यह भी एक कारण है जो मध्यकालीन भारत के इतिहास को ओर भी सम्पन्न बनाता है। भारत ही वह धरती है जिसने अनेक कलाओं को जन्म दिया फिर वो- हस्त कला हो, शिल्प कला हो या वास्तुविद कला। भारत हमेशा से ही सर्वश्रेष्ठ रहा है।

मध्यकालीन भारत के शिल्पकर्ता (Craftsperson) इस इतिहास की एक अहम कड़ी हैं। जिनमे प्रमुख तौर पर- बीदर के शिल्पकर्ताओं का नाम ताँबे (Copper) और चाँदी (Silver)  के लिये इतना प्रचलित रहा है की फिर इन्हें बिदरी के नाम से जाना जाने लगा।

पांचाल (Panchal) और विश्वकर्मा (Vishwakarna) समुदाय के सुनार (Goldsmith) लोहार (Copper Smith) कांस्य कर्ता (Bronzesmith) और बढ़ई (Carpenter) की ख़ास महत्वता था क्योंकि यह सभी प्रकार के कारीगरी का कार्य करते थे जिसके इस्तेमाल इमारतों, महलों, अस्त्रों- शस्त्रों और कवचों बनाने में होता था।

साथ ही साथ आभुषण निर्माण कला, संगमरमर वास्तुशिल्प कला, काँच निर्माण कला, मख़लमल बुनने की कला, मीनाकारी, मिट्टी के बर्तन बनाने की कला, लकड़ी की वस्तओं को बनाने की कला प्रमुख थी। शिल्पकला का विकास मुख्यतः पाल सम्राज्य, चोल साम्राजय और मुग़ल साम्राज्य के शासन काल के दौरान हुई।

मध्यकालीन भारत के शिल्प कार्य

  • बिदरिवर (Bidriware)
  • पेम्बरथी (Pembarthi)
  • ढोकरा (Dhokra)
  • कमरूपी (Kamrupi)

बिदरिवर शिल्पकला का जन्म 14 वीं शताब्दी के दौरान हुआ। यह कला मूलतः धातु (Metal) पर आधारित है। जो बीदर शिल्पकर्ताओं की देन है। जिनमें रहामन पटेल (Rahaman Patel), रशीद अहमद (Rasheed Ahmed) शाह रशीद (Shah Rasheed) मुख्य थे।

पेम्बरथी (Pembarthi) शिल्प कला का जन्म पेम्बरथी में ही हुआ जो की वर्तमान में तेलांगना प्रदेश का भाग है। यह कला धातु कला पर ही आधारित थी।इस कला का विकास चोल वंश जे शासन काल में हुआ था।

मध्यकालीन भारत के शिल्प कार्य

कमरूपी (Kamrupi) कला मुख्यतः पीतल पर आधारित थी। इस कला में बर्तनों का निर्माण प्रमुख था। इस कला का विकास मुग़ल साम्राज्य के काल मे सबसे अधिक हुआ।

मध्यकालीन सामान्यतः मध्यकालीन भारत का 7 वीं शताब्दी से आरम्भ होकर 16 वीं शताब्दी के मध्य तक चला। तक के भारत तथा उसके पड़ोसी देशों जो सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक दृष्टि से उसके अंग रहे हैं, से लगाया जाता है। मध्यकालीन भक़री का इतिहास नगरों, व्यापार और शिल्पकला तीनो ही क्षेत्रों में सर्वश्रेष्ठ रहा है।

मध्यकालीन भारत के नगर, व्यापारियों और शिल्पकर्ताओं का पूरा इतिहास अति व्यापक और बड़ा रहा है। मध्यकालीन भारत ही इतिहास का वो काल है जब नगरों का निर्माण सबसे अधिक हुआ क्योंकि यहीं वो दौर था जब राजनधानी घोषित की गई थी। साथ ही साथ शिल्प और व्यापार के क्षेत्र में भी मुख्य विकास हुआ।

तो यह था मध्यकालीन भारत के नगर, व्यापारियों और शिल्पकर्ताओं का पूरा इतिहास Full History of Towns, Traders and Craftspersons of Medieval India.

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