सकारात्मक सोच का महत्व काफी बार हमारे दिमाग में आता है कि सकारात्मक सोच क्या है ? इसका जीवन में क्या महत्व है ? कैसे ये हमारे जीवन को प्रभावित कर सकती है ? तथा किस तरह से हम इसको विकसित कर सकते हैं ? इन सारे सवालों के साथ-साथ हमारे दिमाग में इसके विपरीत अर्थात नकारात्मक सोच के बारे में भी ऐसे ही कुछ सवाल उत्पन्न होते हैं , तथा हम उनके बारे में सोचते रहते हैं , आज का आर्टिकल भी इसी विषय पर ह ।

सर्वप्रथम यह जानना जरूरी है कि सकारात्मक सोच है क्या ? एक विद्यार्थी के दृष्टिकोण से देखें तो क्या किसी प्रतियोगी परीक्षा के बारे में पूर्वानुमान होना की मैं इस परीक्षा में अवश्य ही उत्तीर्ण हो जाऊँगा , ओर ये सोच के उस परीक्षा की तैयारी करना !

सकारात्मक सोच क्या है Result Of Positive Thinkingसकारात्मक सोच और उसके परिणाम Result Of Positive Thinking

एक सकारात्मक सोच है ? क्या एक किसान के लिए सकारात्मक सोच यह है कि वह ये सोचे कि इस बार फसल की पैदावार काफी अच्छी होगी ? एक फर्म के मालिक के लिए यह कि एक निर्धारित समयावधि के बाद उसके फर्म के उत्पादों की मांग बढ़ जाएगी , लोग उसको पसंद करने लग जाएंगे , जिससे उनकी कीमतें बढ़ने लगेंगी और उसे इसका  बहुत फायदा होगा ?

प्रत्येक व्यक्ति के लिये सकारात्मक सोच का पैमाने भिन्न है , सामान्य जीवन की बात करें तो एक व्यक्ति चाहे वो विद्यार्थी हो, शिक्षक हो , किसान हो , मजदूर हो, नेता हो, व्यापारी हो अथवा किसी खेल का कोई खिलाड़ी ही क्यों न हो जीवन में रिश्ते तो हर किसी को निभाने ही पड़ते हैं ।

ये रिश्ता भले ही माता-पुत्र का हो, पिता-पुत्र का हो , भाई-बहन का हो , या चाहे यह प्रेमी – प्रेमिका का ही क्यों न हो इसमें सकारात्मक भावना , एक सकारात्मक सोच की आवश्यकता तो अवश्य ही होती है । अब सवाल ये उठता है कि ये सकारात्मक भावना है क्या ?ओर ये किस तरह से कार्य करती है।

सकारात्मक सोच और उसके परिणाम

सकारात्मकसोच का अगर शाब्दिक अर्थ देखें तो सोच का वह पहलू जो हमेशा एक आशा जगाये रखे , जिसको हम एक यथार्थतावादी सोच कह सकते हैं । आशा जगाने वाली सोच बशर्ते इसके कि यह वास्तविक हो ज्यादा काल्पनिक नही हो अर्थात उसका वास्तविक जीवन से संबंध हो ।

सकारात्मक सोचलक्ष्य निर्धारण तथा सफलता प्राप्ति के मध्य की एक महत्वपूर्ण कड़ी है , हालांकि इसकी आवश्यकता लक्ष्य निर्धारण के वक्त भी होती है । जब कोई व्यक्ति अपना लक्ष्य निर्धारित करता है तो उसको सबसे पहले अपनी काबिलियत का अनुमान होना चाहिए तथा साथ ही साथ उस लक्ष्य के प्रति सकारात्मक सोच होनी चाहिए ,

अगर वह प्रारम्भ में ही यह सोच ले कि यह लक्ष्य जो मैंने निर्धारित किया है वह काफी मुश्किल है और मैं इसे नहीं कर पाऊंगा इस वक्त उस व्यक्ति की सकारात्मक सोच का स्तर काफी नीचा है तथा साथ ही साथ उसके सफल होने की संभावना भी कम हो जाती है ।

सकारात्मक सोच आत्मविश्वास को भी बढ़ावा देती है, अगर हम किसी लक्ष्य विशेष के प्रति सकारात्मक सोच ले के चलते हैं तो उस लक्ष्य को हासिल करने के लिए आत्मविश्वास भी बढ़ जाता है ।

जीवन में सकारात्मक सोच का महत्व

किसी भी लक्ष्य के निर्धारण के बाद भी इसी सकारात्मक सोच का उतना ही महत्व रहता है जितना कि पहले था । लक्ष्य के निर्धारण के उपरांत और इसकी प्राप्ति के मध्य भी एक समयावधि होती है जिस समय हमें सकारात्मक सोच की अत्यंत आवश्यकता होती है , इस दौरान हमें धैर्य तथा सकारात्मक सोच के साथ कठोर परिश्रम की भी जरूरत होती है ।

जिस प्रकार किसी भी वस्तु की परिसीमा होती है और होनी भी चाहिए वैसा ही सकारात्मक सोच के साथ भी होता है चूंकि यह आत्मविश्वास को बढ़ावा देती है , तो कभी-कभी हमारा आत्मविश्वास हद से अधिक बढ़ जाता है जिसे overconfidence अथवा अति-आत्मविश्वास कह सकते हैं और यही overconfidence हमारी असफलता का भी कारण बनता है ।

अब जरा विचार करते हैं उन प्रश्नों के बारे में जो प्रत्येक व्यक्ति के दिमाग में आते हैं ,

एक विद्यार्थी के लिए सकारात्मक सोच , उदाहरण के तौर पर मानते हैं कि अनुज नाम का एक विद्यार्थी है जो कि भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहा है यानी उसने अपना लक्ष्य निर्धारित कर लिया है जो कि प्रशासनिक सेवा परीक्षा में  चयनित होना है.

अब वह यह सोचता है कि उसका प्रशासनिक सेवा परीक्षा में चयन तो हो ही जायेगा और वो overconfident हो जाता है और इस परीक्षा को इतनी गंभीरता से नही लेता है जितना कि उसे उसको लेना चाहिए और अंत में वो असफल हो जाता है.

सकारात्मक सोच में चिंतन का महत्व

अब यहां पर केवल यही सोचना की मेरा चयन तो हो ही जायेगा एक सकारात्मक सोच नही है , अब यहाँ अनुज को यह सोचना चाहिए कि मेरा चयन तो होगा ही परंतु मैं ऐसा क्या करूँ जिससे यह संभव हो सके, एक परीक्षा में तो काफी सारे अभ्यर्थी होते हैं जिनके अंदर भी एक सकारात्मक सोच होती है.

परंतु चयनितों की संख्या इन सकारात्मक सोच वाले लोगों से काफी कम होती है । आखिर ऐसा क्यों होता है कि हमारे पास सकारात्मक सोच होने के बावजूद भी हम असफल हो जाते हैं यहां पर सवाल यह उठता है कि क्या  केवल सकारात्मक सोच होना  ही सफल होने के लिए पर्याप्त है ? तो इसका जवाब होगा नही!

क्योंकि कोई भी इंसान केवल अच्छा सोच के ही महान अथवा सफल नही बन सकता परंतु एक बात यह भी है कि महान अथवा सफल इंसान भी उन्ही लोगों में से ही कोई बनता है जो अच्छा या सकारात्मक सोचते हैं आर्थात सफलता की प्रथम कुंजी है सकारात्मक सोच । जिस दिन से , जिस पल से अनुज ने सकारात्मक सोचना बंद कर दिया मतलब इसके विपरीत नकारात्मक सोचना प्रारम्भ कर दिया उसी पल से अनुज के सफल होने की संभावनाएं घटती चली जाएगी और ऐसा ही हम सबके साथ होता है ।

सकारात्मक सोच कैसे बनाये | How to Develop Positive Thinking in hindi

एक विद्यार्थी के लिए सकारात्मक सोच का मतलब असफलता के बाद भी उतना ही होता है जितना कि पहले । अब जैसे एक छात्र था जिसने बारहवीं कक्षा में सत्तानवे प्रतिशत अंक अर्जित करने का लक्ष्य रखा परंतु वह केवल चौरानवे प्रतिशत अंक ही हासिल कर सका.

इस असफलता से वह काफी दुखी हुआ और उसने आत्महत्या कर ली । यहाँ जब बारहवीं परीक्षा का परिणाम आया तभी उसकी सोच की परीक्षा प्रारम्भ हो गयी , बारहवीं की परीक्षा में तो वो उत्तीर्ण हो गया परंतु सोच की परीक्षा में वह अनुतीर्ण हो गया वह यह सोच बैठा कि यह उसकी जिंदगी का अंतिम मौका था.

और उसने इसे गवा दिया और उसकी इसी सोच ने उसे आत्महत्या के लिए प्रेरित किया , जबकि यहाँ पर उसको यह सोचना चाहिए था कि जिंदगी में केवल एक ही मौका नही आता यहाँ अपने आप को साबित करने के लिए काफी अवसर मिलते हैं , अगर एक चूक भी गया तो कोई नही हमे ओर भी कई मौके मिलेंगे और मैं अगला मौका नही गवाऊंगा और मैं जीवन में अवश्य ही सफल होऊँगा ।

How to develop positive thinking in hindi

अब बात करते हैं दो मित्रों की जो कि किसी कंपनी में जॉब पाने के लिए इंटरव्यू देने जा रहे हैं , दोनो ही दोस्त गरीब घरों से हैं और उनको जॉब की अत्यंत आवश्यकता है , दोनो ही दोस्त काफी सकारात्मक हैं , दोनो ही यह सोच के चल रहे हैं कि वो अपना शतप्रतिशत इंटरव्यू में देंगे.

और उसको सफलतापूर्वक पार करेंगे परन्तु दोनो ही दोस्तों की सोच में भिन्नता नजर आती है जब बात इंटरव्यू में सफल होने के बाद कि करते हैं । एक दोस्त सोचता है कि सफलता मिलने के बाद उसकी जिंदगी काफी आसान हो जाएगी और उसे ज्यादा मेहनत की भी जरूरत नही पड़ेगी.

परंतु दूसरा मित्र यह सोचता है की इंटरव्यू में सफलता मिलने के बाद भी वो अपना शतप्रतिशत जॉब में देगा और पूरी लगन के साथ काम करेगा , वो इंटरव्यू से पहले उस कंपनी के बारे मे सारा अध्ययन कर के जाता है कि वह अपने पद पर रह कर किस तरह से कंपनी को ज्यादा से ज्यादा फायदा पहुंचा सकता है.

सकारात्मक का मतलब

उसकी सोच में ईमानदारी एवं सकारात्मकता साफ साफ झलकती है । चूँकि दोनो ही मित्र गरीब घर से सम्बंध रखते हैं तो दोनों को ही उस जॉब की बहुत जरूरत होती है , अब अगर एक संभावना लेकर चलें कि दोनों का ही चयन उस इंटरव्यू में नही होता है.

इस स्थिति में प्रथम मित्र जो केवल ख्वाबी पुलाव खा रहा था सरल जिंदगी के वो काफी दुखी होगा परंतु जिस व्यक्ति ने अपने भले के साथ साथ कम्पनी के भी हित में सोचा वह कम दुखी होगा क्योंकि वह यह सोचेगा कि कंपनी ने एक अच्छे कर्मचारी को खो दिया , ओर ऐसी सकारात्मक सोच रखने वाले लोग ही सफल हो पाते हैं जिंदगी में ।

रिश्तों में भी सकारात्मकता की एक अहम भूमिका होती है । रिश्तों की  यह  सकारात्मकता तब और भी बढ़ती है जब हम इनमें कम आशाएं रखते हैं । जब से हम यह आशा करने लग जाते हैं कि वो मेरे लिए ये करेगा अथवा करेगी , और वो इंसान जब वह नही कर पाता है तो रिश्तों में दरारें आने लग जाती हैं.

A JOURNEY IN TO HEALING: सकारात्मक सोच की शक्ति

आशाएं रखने वाला इंसान यह मानने लग जाता है कि उसकी अहमियत कम होने लगी है तथा जिस व्यक्ति से आशाएं रखी गयी हैं वह अपने आप को दोषी मानने लग जाता है और इस प्रकार से संबंधों में खटास आने लगती है।

Read More:- आलस को दूर करने के 50 तरीके । How To Overcome Laziness

अर्थात सकारात्मक सोच किसी भी इंसान की जिंदगी में एक अभिन्न एवं महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।

नमस्कार,आप सभी के सहयोग से हमारा यह blog, हिन्दी भाषा Me History Se सम्बंधित जानकारी उपलब्ध करवाने वाला एक popular website बनते जा रहा है. इसी तरह अपना सहयोग देते रहिये और हम आपके लिए नईं-नईं जानकारी उपलब्ध करवाते रहेंगे. :)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here