मध्यकालीन भारत के इतिहास में 18वी शताब्दी Medieval India History of 18th Century India: के शुरुआती दौर में मुगल साम्राज्य (Mughal Empire) नए शासकों के आने के परिणाम स्वरूप पुनः स्थापना हुई तो आइए जानते है 18 वीं शताब्दी कि शुरुआत में भारत के इतिहास में क्या बदलाव आए यह वहीँ दौर था.

मध्यकालीन भारत 18 वीं सदी के भारत का इतिहास की जानकारी

जब तृतिय पानीपत युद्ध (Battle of Panipat) के दौरान औरंगज़ेब (Aurangzeb) की मृत्यु हुई थी क्योंकि यही दौर 18 वीं शताब्दी के लिए नींव के समान था जिसने इतिहास के पन्नो में अपनी महत्वता को दर्ज किया यहाँ पढ़िए 18 वी शताब्दी का पूरा इतिहास।

मध्यकालीन भारत 18वी शताब्दी के भारत का इतिहास की जानकारी

मुगल साम्राज्य पर संकट Crisis of Mughal Empire

मुग़ल शासक औरंगज़ेब ने अपने साम्राज्य के सैनिक और आर्थिक (Military and financial) बल को नश्वरता के सीमा तक पहुँचा दिया था और इसका कारण था दक्खन (Deccan) पर एक लंबे समय तक युद्ध करना। मुग़ल साम्राज्य में आर्थिक बल की ज़िम्मेदारी सूबेदारों (Governors) को.

और सैनिक बल की ज़िम्मेदारी दीवानों (Head Of Military) को सौंपी गई थी जिसके चलते उनके पास अनेक राजनैतिक और प्रशासनिक ताकतें मिल गई थी और उन्होंने इन ताकतों का असहज इस्तेमाल किया और ज़मींदार और किसानों की बीच की विपरीत परिस्थितियाँ भी मुख्य कारण बनीं।

Medieval India History of 18th Century India in hindi

नए नगरों का गठन Emergence of New States

18 वीं शताब्दी (18th Century) की शुरुआत के साथ ही मुगल साम्राज्य अनेक स्वतंत्र राज्यों में विभाजित हो गया। मध्यकालीन इतिहास के अनुसार इसको 3 भागों में बताया जा सकता है- 1. मुगल साम्राज्य के प्राचीन राज्य (Old Mughal Provinces) 2. अर्धरूप से स्वतंत्र राज्य (Partially free states) 3. मराठा शासन में आने वाले राज्य (States under the control of Marathas)

राजपूतों के वतन जागीर (Watan jagir of Rajputs)

18 वीं शताब्दी में कई राजपूत शासकों ने अपना पूर्ण अधिपत्य स्थापित करने के प्रयास किये, जिसके चलते जोधपुर के राजा अजीत सिंह (Ajit Singh) ने गुजरात की बागडोर संभाली और राजा जय सिंह (Jai Singh) मालवा के राजा बने। इन्होंने अपने पड़ोसी सीमाओं पर भी अधिपत्य जमाने का प्रयास किया और इनको ही मध्यकालीन इतिहास में वतन जागीर कहा गया।

स्वंत्रता पर कब्ज़ा Seizing Independence

पंजाबी Sikhs-

17 वीं शताब्दी के अंत तक पंजाबी शासन एक सफल मुकाम हासिल कर चुका था और यहीं कारण था की आगे चलकर पंजाबी शासन ने क्षेत्रीय अधिपत्य में भी अपने कदम आगे बढ़ाए और सफलता को प्राप्त किया। गुरु गोबिंद सिंह (Guru Gobind Singh) ने राजपूतों और मराठाओं से मृत्यु होने तक युद्ध किया.

और उनकी मृत्यु के बाद बुंदा बहादुर (Bunda Bahadur) ने इस लड़ाई को जारी रखा समस्त सिख समुदाय बैसाखी पर (Baisakhi) अमृतसर में मिलकर एकमत को सामने रखकर कर फैसले लेता था खालसा (Khalasa) ने 1765 में अपने नियमों को अपना सिक्का(coin) लागू करते हुए निर्धारित किया। महाराजा रंजीत सिंह (Ranjeet Singh) ने 1799 में लाहौर (Lahore) समस्त समुदाय को एकजुट किया।

मराठा Marathas

मध्यकालीन भारत के इतिहास के दौरान मराठा भी मुगल साम्राज्य के विपक्ष में एक बड़ी ताकत बन सामने आए मराठा शासक शिवजी (Shivaji) ने एक सशक्त शासन का निर्माण देशमुख (Deshmukhs) और कुंबिस (kunbis) की सहायता से(1627-1680) के मध्य में किया।

पूना (Pune) मराठा साम्राज्य की राजधानी बनीं शिवजी बाद पेशवा ने मज़बूत नीतियों का गठन किया और मुगल साम्राज्य ओर हावी हुए 1730 में मराठा शासक ने डेक्कन में अपना एकाधिकार हासिल किया फिर मराठाओं का कारवाँ दिल्ली तक पहुंचा लेकिन वहाँ उन्हें एकाधिकार हासिल ना ही सका।

लेकिन यह मराठा साम्राज्य की ताकत का एक विशेष स्त्रोत था इसके परिणाम स्वरूप अन्य शासक मराठाओं के विपक्ष में खड़े हों गए और उनका पानीपत के तीसरे युद्ध (Third Battle of Panipat) के दौरान साथ नहीं दिया मराठाओं के शासन केंद्र में मालवा ओर उज्जैन प्रमुख नगर थे जहाँ सभी राजनैतिक और प्रशासनिक परिस्थितियों को सामने लाया गया। जिसने 18वी शताब्दी (18th Century)के इतिहास की संरचना की।

जाट jats-

मध्यकालीन इतिहास में 18वी शताब्दी की शुरुआत में जाटों ने भी अपना आधिपत्य हासिल किया राजा चुरामन (Churaman) के शासनकाल में जाटों ने दिल्ली के दक्षिण हिस्सों को हासिल किया साथ ही साथ उन्होंने आगरा के कुछ हिस्सों को भी हासिल किया।

जाट (Jaat) मूल रूप से सम्पन्न किसान थे। पानीपत और बल्लभगढ़ (Panipat and Ballabgarh) इनके मुख्य व्यवसाय केंद्र थे। जाटों के साम्राज्य अन्य प्रमुख नाम थे- नादिर शाह (Nadir Shah) और जवाहिर शाह (Jawahi Shah)

हैदराबाद Hyderabad-

असफ जाह (Asaf jah) को मुगल शासकों द्वारा हैदराबाद का निज़ाम उल मुल्क (Nizam Ul Mulk) बनाया गया क्योंकि उस दौरान हैदराबाद Hyderabad लगातार मराठाओं (Maratha) के आक्रमण का शिकार हो रहा था। साथ ही साथ तेलुगु योद्धाओं का भी ख़तरा चरम पर था।

असफ जाह (Asaf jah को मुग़ल शासक फारुख सियार (Farukh Siyar) द्वारा हैदराबाद का निज़ाम उल मुल्क (Nizam Ul Mulk) बनाया गया था। जो 18वी शताब्दी के इतिहास का मुख्य हिस्सा बना।

अवध Awadh

सद्दात खान को 1722 में अवध का सूबेदार बनाया गया। अवध मध्यकालीन भारत के इतिहास में व्यापार का एक मुख्य केंद्र था साथ ही साथ यह भारत और नेपाल (India and Nepal) के व्यापार के रास्ते में मुख्य बिंदु था। यहाँ दिवानी, सूबेदारी और फौज का भी केंद्र स्थापित किया गया।

यह राज्य आर्थिक रूप से महाजनों (mahajan) पर निर्भर था। साथ ही साथ किसानों को कर भी चुकाना पड़ता था, जिसके परिणामस्वरूप यहाँ आर्थिक स्तिथि सशक्त हुई और अनेक सूबेदारों ने यहाँ के आर्थिक तत्व को और भी मज़बूत किया। जो 18वी शताब्दी  (18th Century)  के इतिहास का विशेष भाग रहा।

बंगाल Bengal-

बंगाल आकसिमक रूप से मुग़ल (Mugal Empire) से अलग हुआ, यह सब मुर्शिद कुली खान (Murshid Quki khan) के नेतृत्व में हुआ जो बंगाल के राज्यपाल थे। अवध और हैदराबाद (Awadh And Hyderabad) के तरह ही यहाँ भी राज्यपाल ही सभी राजनैतिक (Political) प्रशासनिक (Administrative) और आर्थिक (Economical) पहलुओं पर फैसले लेते थे।

ज़मींदारों से मोटा कर वसूल किया जाता था। यह अध्याय यह दर्शाता है कि किस प्रकार से 18 वी शताब्दी (18th Century) तक यह तीनों प्रमुख राज्य मुगल साम्राज्य (Mughal Empire) से पूरी तौर से अलग हुए और 18वी शताब्दी के इतिहास का अहम अंग बन गए.

ReadMore:- मध्यकालीन भारत की क्षेत्रीय संस्कृति Regional Culture Of Medieval India

आखिरकार 18वी शताब्दी (18th Century) में सभी साम्राज्यों का पतन हुआ और ब्रिटिश साम्राज्य (British Empire)  भारत में आया। तो यह था मध्यकालीन भारत के दौरान 18 वी शताब्दी का सम्पूर्ण इतिहास।

नमस्कार,आप सभी के सहयोग से हमारा यह blog, हिन्दी भाषा Me History Se सम्बंधित जानकारी उपलब्ध करवाने वाला एक popular website बनते जा रहा है. इसी तरह अपना सहयोग देते रहिये और हम आपके लिए नईं-नईं जानकारी उपलब्ध करवाते रहेंगे. :)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here