भारतीय इतिहास में जब भी वीरता और स्वाभिमान की बात आती है, तो महाराणा सांगा (संग्राम सिंह) का नाम बड़े गर्व से लिया जाता है। वे मेवाड़ के एक ऐसे शासक थे जिन्होंने अपने शरीर पर 80 घाव होने के बावजूद कभी युद्ध के मैदान में पीठ नहीं दिखाई।

महाराणा सांगा: अदम्य साहस की प्रतिमूर्ति

महाराणा सांगा ने अपने जीवन में कई युद्ध लड़े। एक युद्ध में उन्होंने अपना एक हाथ खो दिया, दूसरे में एक पैर और एक आँख, फिर भी उनका मनोबल कभी कम नहीं हुआ। उन्हें ‘हिंदूपति’ की उपाधि दी गई थी क्योंकि उन्होंने उत्तर भारत के कई राजाओं को एक ध्वज के नीचे संगठित किया था।

खातोली और बाड़ी के युद्ध

सांगा ने दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी को खातोली और बाड़ी के युद्धों में करारी शिकस्त दी थी। उनकी बढ़ती शक्ति से उस समय के सभी सुल्तान भयभीत रहते थे।

खानवा का ऐतिहासिक युद्ध (1527)

मुगल शासक बाबर के खिलाफ खानवा का युद्ध भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। हालांकि इस युद्ध में सांगा को सफलता नहीं मिली, लेकिन उनके साहस ने बाबर को भी अचंभित कर दिया था।

महाराणा सांगा का जीवन हमें सिखाता है कि शारीरिक अक्षमता कभी भी वीरता के मार्ग में बाधा नहीं बन सकती।