भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में मंगल पांडे से भी 33 साल पहले आजादी का बिगुल फूंकने वाले नरसिंहगढ़ के राजकुमार कुंवर चैन सिंह को ‘मालवा का मंगल पांडे’ कहा जाता है। उन्होंने अंग्रेजों की गुलामी स्वीकार करने के बजाय युद्ध के मैदान में वीरगति पाना बेहतर समझा।
पारिवारिक पृष्ठभूमि और विवाह
कुंवर चैन सिंह का विवाह मुवालिया जागीर की राजकुमारी कुंवरानी सा राजावत जी के साथ हुआ था। वे झिलाय के ठाकुर साहब शिवनाथ सिंह जी राजावत की सुपुत्री थीं। ठाकुर शिवनाथ सिंह जी को नरसिंहगढ़ रियासत में ‘सोनानवीज’ जागीरदार का प्रतिष्ठित पद और मुवालिया जागीर प्रदान की गई थी।
अफीम व्यापार और अंग्रेजों की दमनकारी शर्तें
कुंवर चैन सिंह और अंग्रेजों के बीच संघर्ष का एक मुख्य कारण आर्थिक और राजनीतिक हस्तक्षेप था। उस समय मालवा क्षेत्र की अफीम अपनी गुणवत्ता के लिए विश्व प्रसिद्ध थी। अंग्रेज पॉलिटिकल एजेंट मैडॉक ने कुंवर चैन सिंह के सामने यह शर्त रखी कि नरसिंहगढ़ रियासत में पैदा होने वाली समस्त अफीम केवल अंग्रेजों को ही बेची जाएगी और उसका मूल्य भी अंग्रेज ही तय करेंगे।
इतना ही नहीं, अंग्रेजों ने यह भी शर्त रखी कि रियासत की सुरक्षा के नाम पर तैनात सेना का खर्च भी नरसिंहगढ़ ही उठाएगा और अंग्रेज अधिकारी रियासत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करेंगे। कुंवर चैन सिंह ने इन शर्तों को अपनी मातृभूमि की संप्रभुता और स्वाभिमान पर सीधा प्रहार माना और इन्हें सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि मालवा की मिट्टी पर पैदा होने वाली फसल पर पहला अधिकार यहाँ के किसानों और राज्य का है, न कि विदेशी हुकूमत का।
सीहोर का युद्ध और ससुर साहब का बलिदान
जब बातचीत विफल हो गई, तो 24 जुलाई, 1824 को सीहोर के दशहरा मैदान में भीषण युद्ध छिड़ गया। कुंवर चैन सिंह के ससुर, ठाकुर शिवनाथ सिंह जी राजावत, ने अपने दामाद के कंधे से कंधा मिलाकर युद्ध किया। उन्होंने अंग्रेजों की विशाल सेना और तोपों का डटकर मुकाबला किया और मातृभूमि की रक्षा करते हुए वहीं वीरगति प्राप्त की।
वीर साथी और अटूट वफादारी
इस युद्ध में कुंवर चैन सिंह के साथ उनके जांबाज साथी हिम्मत खां और बहादुर खां भी शहीद हुए थे। इन योद्धाओं के अदम्य साहस के कारण ही अंग्रेजों की विशाल सेना के छक्के छूट गए थे। आज भी सीहोर में कुंवर चैन सिंह की छतरी के पास इन वीर योद्धाओं की यादें सुरक्षित हैं।
ऐतिहासिक महत्व
कुंवर चैन सिंह और उनके ससुर ठाकुर शिवनाथ सिंह जी का यह बलिदान नरसिंहगढ़ और मालवा के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा गया है। यह युद्ध दर्शाता है कि कैसे पूरा परिवार और उनके वफादार साथी स्वतंत्रता की वेदी पर न्योछावर हो गए थे।
कुंवर चैन सिंह और उनके साथियों का यह बलिदान हमें सदैव स्वाभिमान और वीरता की प्रेरणा देता रहेगा।